Monday, July 26, 2010

‘सपने’

आजकल पुरानी यादों को ताज़ा कर रहा हुं...पुराने पन्नो को पलटता हुं तो कुछ न कुछ ऐसा मिल जाता है जो दिल से जुड़ा होता है...जब सपने बहुत आते थे, उस समय एक कविता लिखी थी....

सब कुछ हो पास अपने, यही सपना है,
सबके हो खास बस, यही सपना है...
कौन कहता है सपने पूरे नहीं होते ?
उॅंची हो उड़ान तो हर मुश्किल आसान,
फिर हकीकत जो है वही सपना है....

छोड़़ गया वो साथ जिसको माना अपना,
जिसको माना पराया वही अपना है...

ये सपने भी सच होते हैं,
कभी हम हॅंसते हैं, कभी रोते हैं।
फड़फड़ा कर अपने पंख हम भी उड़ना चाहते हैं,
म्ंजिल की ओर दूर कहीं सितारों में,
हम भी खोना चाहते हैं
उन खूबसूरत वादियों में, उन महकती फिजाओं में,
उन हवाओं में, उन घटाओं में,
हम भी कहीं खड़े रहें,
बस यही सपना है...

कुछ कर दिखाना है,
हम भी हैं कुछ, ये बताना है,
जो करते थे हमसे दोस्ती के नाटक,
नाटक के परदे को गिराना है,
पता लगाना है कौन अपना, कौन बेगाना है...
बस यही सपना है...
जि़न्दगी कि दौड़ में हमसफर है न कोई।
ये तो लंगड़े घोड़े हैं जो दौड़ रहे हैं,
कुछ दूर जाकर गिरेंगे, ये दिखाना है
बस यही सपना है...

हिमांशु डबराल

Friday, July 16, 2010

मॉं.....

आज पुरानी डायरी के कुछ पन्नो को पलटते हुए माँ पर लिखी मेरी एक कविता दिखी जो उस समय की है जब मैने कविता लिखना शुरू किया था...माँ के बारें में मेरे दिल से लिखी कुछ पंक्तियाँ-

मॉं मूरत है ममता की,
मॉं सूरत है समता की,
मॉं जग में है सबसे प्यारी,
बच्चो के दुख हरने वाली,
जीवन उजीयारा करने वाली,
सच मॉं मूरत है ममता की...

भूखी रहकर हमे खिलाए,
दुखी रहकर हमे हसाए,
खुद जाग वो हमे सुलाए,
सच मॉं मूरत है ममता की...

ठोकर जब तुम खाओगे,
दुख मे जब धिर जाओगे,
मॉ से ही सुख पाओगे,
सच मॉं मूरत है ममता की...


मॉं को न तुम कभी भूलाना,
मॉं को न तुम कभी सताना,

सुख से मॉं का जीवन भर दो,
मॉ नाम तुम रोशन कर दो

क्यूंकि सच है की, मॉं मूरत है ममता की...


-हिमांशु डबराल

himanshu dabral

Saturday, July 3, 2010

रहता रहा...

मैं उन्हें कुछ न कहकर भी कुछ कहता रहा,
जिंदगी के ग़मों को यूँ ही हँस कर सहता रहा....
.
रह न सकता था जिस खंडर में एक पल कभी,

मैं उसी को घर समझ के रहता रहा...

-हिमांशु डबराल

Monday, June 28, 2010

विजयी भव:

आपने वह डायलौग तो सुना ही होगा- ''हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं''. शाहरुख़ खान कि सुपरहिट फिल्म बाज़ीगर कि यह लाइन भारतीय क्रिकेट टीम पर पूरी तरह फिट बैठती है. तीसरे टी-२० विश्वकप में मुँह की खाने के बाद, भारतीय क्रिकेट तम ने एक अरसे बाद अपने प्रशंसको को खुश कर दिया है. दरअसल भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के चेहरे पर यह मुस्कान एशिया कप जीतने के बाद आई है. हाल ही में एशिया कप जीतकर आई इस टीम को देखकर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यह वही टीम है, जिसे टी-२० विश्वकप के सुपर-८ चरण में ही बाहर होना पड़ा था. विश्कप में ख़राब प्रदर्शन की गाज़ खिलाडियों पर गिरी और नाराज़ चयनकर्ताओं ने ज़िंबाबवे दौरे के लिए युवा टीम को मौका दिया. सुरेश रैना की अगुवाई वाली युवा टीम ने यहाँ भी निराश किया. ज़िंबाबवे जैसी टीम से अपने दोनों मैच हारने के बाद टीम बिना फाइनल खेले स्वदेश लौट आई. सीनियर और युवा खिलाड़ियों के ख़राब प्रदर्शन को लेकर चयनकर्ताओं के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ देखि जा सकती थीं. सामने एशिया कप था, जहाँ भारतीय टीम को श्रीलंका, बांग्लादेश और चिर-प्रतिद्वंदी पाकिस्तान से भिड़ना था. इस बार चयनकर्ताओं ने युवाओं के जोश और सीनियर खिलाड़ियों के होश का काकटेल बनाया. महेंद्र सिंह धोनी को खुद को अच्छा कप्तान साबित करने का आखरी मौका दिया गया. इस बार भारतीय टीम ने किसी को निराश नही किया और चैम्पियनों की तरह खेलते हुए एशिया कप जीत लिया. भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गए मैच हमेशा से खेल प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं. और शायद पूरे एशिया कप में से क्रिकेट प्रेमियों को सबसे ज्यादा इंतजार, इस मैच का ही था. हार बार की तरह इस बार भी इस मैच में वो सब कुछ था जो इन चिर-प्रतिद्वंदियों के मैच में देखने को मिलता है. मैच के बीच में हमेशा की तरह खिलाड़ियों के बीच झड़प हुई जिसमे अम्पायरों ने बीच-बचाव किया. बहरहाल, कड़ी टक्कर, तनाव और बेहद रोमांच से भरे इस मैच को भारत ने ३ विकेट से जीत लिया. इस जीत के साथ ही भारतीय क्रिकेट प्रेमियों में हर्ष की लहर दौड़ गयी. दिल्ली में तो जगह-जगह पटाखे छुटाए गए. दिल्ली के एक क्रिकेट प्रशंसक अमित ने तो यहाँ तक कह डाला कि अब चाहे टीम एशिया कप जीते या हारे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, भारत पाकिस्तान से जीत गया, यह सबसे बड़ी बात है.पाकिस्तान के अलावा भारतीय टीम ने बांग्लादेश को भी ६ विकेट से करारी मात दी. हालाँकि अपने लीग मैच में, भारतीय टीम को श्रीलंका के हाथों ७ विकेट से हार झेलनी पड़ी, पर फाइनल मैच में भारतीय टीम ने अपनी इस हार का बदला ले लिया. फाइनल मैच में भारत ने श्रीलंका को ८१ रन से हराकर ख़िताब पर कब्जा किया. जहाँ फाइनल मैच में 'मैन ऑफ द मैच' दिनेश कार्तिक को दिया गया, वहीं पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी एशिया कप में ८८.३ की औसत से २६५ रन बनाकर मैन ऑफ द सीरीज़ बने. इस शानदार और 'कमबैक' जीत से खुश भारतीय चयनकर्ताओं ने १८ जुलाई से श्रीलंका में शुरू होने वाली ३ टेस्ट मैचों की सीरीज़ के लिए भारतीय टीम की घोषणा कर दी है. सचिन तेंदुलकर. राहुल द्रविड़ और वी.वी.एस. लक्ष्मण की 'त्रिमूर्ति' को टीम में शामिल किया है. इनके अलावा सहवाग, धोनी, गंभीर और रैना की मौजूदगी से टीम का बल्लेबाजी क्रम ख़ासा मज़बूत नज़र आ रहा है. ज़िम्बाब्वे और एशिया कप से अपने खराब प्रदर्शन के चलते टीम से बाहर किये गए युवराज सिंह को टीम में शामिल किया गया है. युवराज सिंह की प्रतिभा पर शायद ही किसी को शक हो, पर युवी को यह खुद ध्यान रखना चाहिए की लम्बे अरसे से लगातार युवा खिलाडी टेस्ट टीम के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हैं. पिछले कई सीज़नों से रणजी ट्राफी में रनों का पहाड़ खड़ा करने वाले चेतेश्वर पुजारा ने हाल ही में इण्डिया 'ए' की तरफ से खेलते हुए इंग्लैंड में दो सेंचुरी लगाई हैं, जिनमे से एक डबल सेंचुरी है. ज़ाहिर है, चयनकर्ता पुजारा के इस प्रदर्शन को ज्यादा देर तक नज़र अंदाज़ नही कर पाएंगे. खुद को साबित करने का, युवराज का यह आखरी मौका साबित हो सकता है. टीम चयन में दूसरे विकेट-कीपर के रूप में व्रिधिमान साहा का चयन समझ से परे है. एशिया कप में ५३ की औसत से १०६ रन बनाने वाले दिनेश कार्तिक साहा से ज्यादा अनुभवी, विकेट-कीपर हैं. कार्तिक एक अच्छे ओपनर भी हैं, ज़ाहिर है साहा के स्थान पर कार्तिक चयनकर्ताओं के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकते थे. गेंदबाजी विभाग में भी ज़हीर और हरभजन को छोड़ कोई भी खास अनुभवी गेंदबाज़ नहीं है. खैर, देखते हैं, इस बार ऊँट किस करवट बैठता है. टेस्ट टीम इस प्रकार है-महेंद्र सिंह धोनी(कप्तान), वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वी.वी.एस. लक्ष्मण, गौतम गंभीर, मुरली विजय, युवराज सिंह, सुरेश रैना, हरभजन सिंह, ज़हीर खान, इशांत शर्मा, एस. श्रीसंत, अमित मिश्रा, प्रज्ञान ओझा और व्रिधिमान साहा.
-देवास दीक्षित

Friday, June 18, 2010

कब तक खून चूसेंगे परदेसी और परजीवी


- आशुतोष
दुनियां की सर्वाधिक लोमहर्षक औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी का मुख्य आरोपी और यूनियन कार्बाइड का निदेशक वारेन एंडरसन घटना के चार दिन बाद भोपाल आया और औपचारिक गिरफ्तारी के बाद 25 हजार रुपये के निजी मुचलके पर उसे छोड़ दिया गया।
15 हजार से अधिक लोगों की मौत और लाखों लोगों के जीवन पर स्थायी असर डालने वाले इस आपराधिक कृत्य के आरोपी ऐंडरसन को केन्द्र और राज्य सरकार की सहमति से भोपाल से किसी शाही मेहमान की तरह विदा किया गया। उसके लिये राज्य सरकार के विशेष विमान की व्यवस्था की गयी और जिले का कलक्टर और पुलिस कप्तान उसे विमान तल तक छोड़ने के लिये गये। इस कवायद को अंजाम देने के लिये मुख्यमंत्री कार्यालय भी सक्रिय था और दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय भी।
8 दिसंबर 1984 के सी आई ए के दस्तावेज बताते हैं कि यह सारी प्रक्रिया स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की देख-रेख में चली। निचली अदालत द्वारा दिये गये फैसले में भी केन्द्र सरकार का उल्लेख करते हुए उसे लापरवाही के लिये जिम्मेदार माना है। जानकारी हो कि बिना उपयुक्त सुरक्षा उपायों के कंपनी को अत्यंत विषैली गैस मिथाइल आइसोसायनेट आधारित 5 हजार टन कीटनाशक बनाने का लाइसेंस न केवल जारी किया गया अपितु 1982 में इसका नवीनीकरण भी कर दिया गया।
घटना की प्रथमिकी दर्ज कराते समय गैर इरादतन हत्या (धारा 304) के तहत मामला दर्ज किया गया जिसकी जमानत केवल अदालत से ही मिल सकती थी किन्तु चार दिन बाद ही पुलिस ने मुख्य आरोपी से उपरोक्त धारा हटा ली। शेष बची हल्की धाराओं के तहत पुलिस थाने से ही उसे निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ रिहा कर दिया गया कि उसे जब और जहां हाजिर होने का हुक्म दिया जायेगा, वह उसका पालन करेगा। मजे की बात यह है कि जिस मुचलके पर एंडरसन ने हस्ताक्षर किये वह हिन्दी में लिखा गया था।
राज्य में उस समय तैनात रहे जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी कह रहे हैं कि सारा मामला मुख्यमंत्री कार्यालय से संचालित हुआ। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर का अनुमान है कि राजीव गांधी और अर्जुन सिंह के बीच इस मामले में विमर्श हुआ होगा। चर्चा यह भी चल पड़ी है कि एंडरसन ने दिल्ली आ कर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से भी भेंट की थी । इस सबके बीच कांग्रेस प्रवक्ता
का बयान आया है कि – मैं इस मामले में केन्द्र की तत्कालीन सरकार के शामिल होने की बात को खारिज करती हूं।
पूरे प्रकरण से राजीव गांधी का नाम न जुड़ने पाये इसके लिये 10 जनपथ के सिपहसालार सक्रिय हो गये हैं। उनकी चिन्ता भोपाल के गैस पीड़ितों को न्याय मिलने से अधिक इस बात पर है कि राजीव गांधी का नाम जुड़ने से मामले की आंच कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी तक न जा पहुंचे। गनीमत तो यह है कि अर्जुन सिंह ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। किन्तु जिस तरह से अर्जुन को बलि का बकरा बना कर राजीव को बचाने के संकेत मिल रहे हैं, अर्जुन सिंह का बयान पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर सकता है।
दिक्कत एक और भी है। क्वात्रोच्चि का मामला भी लग-भग इसी प्रकार से अंजाम दिया गया था। सीबीआई की भूमिका क्वात्रोच्चिके मामले में भी संदिग्ध थी। न तो सीबीआई उसका प्रत्यर्पण करा सकी और न ही विदेश में उसकी गिरफ्तारी के बाद भी उसे भारत ला सकी। बोफोर्स घोटाले में आज तक मुख्य अभियुक्त को न्यायालय से सजा नहीं मिल सकी । किन्तु जनता की अदालत में राजीव अपने-आप को निर्दोष साबित नहीं कर सके। जिस जनता ने उनकी जवानी और मासूमियत पर रीझ कर ऐतिहासिक बहुमत प्रदान किया था उसी ने उन्हें पटखनी देने में भी देर नहीं की।
कांग्रेस के रणनीतिकारों की चिन्ता है कि मामला अगर आगे बढ़ा तो राहुल बाबा का चेहरा संवारने में जो मशक्कत की जा रही है वह पल भर में ढ़ेर हो जायेगी। वे यह भी जानते हैं कि उनकी निपुणता कोटरी में रचे जाने वाले खेल में तो है लेकिन अपनी लोकसभा से चुनाव जीतने के लिये भी उन्हें गांधी खानदान के इस एकमात्र रोशन चिराग की जरूरत पड़ेगी। इसलिये हर आंधी से उसकी हिफाजत उनकी जिम्मेदारी ही नहीं धर्म भी है।
उल्लेखनीय है कि भोपाल गैस कांड जब हुआ तब राजीव को प्रधानमंत्री बने दो महीने भी नहीं हुए थे। उनकी मंडली में भी वे सभी लोग शामिल थे जो आज सोनिया और राहुल के खास नजदीकी और सलाहकार है। राजीव और सोनिया के रिश्ते या सरोकार अगर क्वात्रोच्चि या एंडरसन के साथ थे, अथवा संदेह का लाभ दें तो कह सकते हैं कि अदृश्य दवाब उन पर काम कर रहा था तो भी, उनके कैबिनेट के वे मंत्री जो इस देश की मिट्टी से जुड़े होने का दावा करते हैं, क्यों कुछ नहीं बोले ?
कारण साफ है। कांग्रेस में नेहरू-गांधी खानदान के इर्द-गिर्द मंडराने वाले राजनेताओं से खानदान के प्रति वफादारी की अपेक्षा है, उनकी सत्यनिष्ठा की नहीं। रीढ़विहीन यह राजनेता उस परजीवी की भांति ही व्यवहार करते हैं जिसका अपने-आप में कोई वजूद नहीं होता। दूसरे के रक्त से अपनी खुराक लेने वाले इन परजीवियों को रक्त चाहिये। यह रक्त राजीव का हो, सोनिया का हो, राहुल का हो या एंडरसन का ।
देश की दृष्टि से देखा जाय तो चाहे परदेसी हो या परजीवी, उसका काम सिर्फ खून चूसना है और अपना काम निकल जाने के बाद उसका पलट कर न देखना नितांत स्वाभाविक है। यही क्वात्रोच्चि ने किया, यही एंडरसन ने। जो क्वत्रोच्चि के हमदर्द थे, वही एंडरसन को भी सहारा दे रहे थे। जिनके चेहरे बेनकाब हो चुके हैं, उनकी चर्चा क्या करना। निर्णय तो यह किया जाना है कि इन परदेसियों और परजीवियों को कब तक देश के साथ छल करने की इजाजत दी जायेगी।

Friday, April 30, 2010

मंज़िल

मंज़िल दिखती है, मगर मिलती नहीं,
मिलती तब है जब दिखना बंद हो जाये...

-हिमांशु डबराल

Monday, April 12, 2010

भिखारियों का महाकुंभ

तीर्थ नगरी हरिद्वार में महाकुंभ चल रहा है। देश-विदेश से आऐ लाखों लोग इस महाकुंभ के साक्षी बनना चाहते हैं। गंगा तट पर आस्था का महासागर देखने को मिल रहा है। लेकिन ये कुंभ आस्था के महाकुंभ के साथ-साथ भिख़ारियों का महाकुंभ भी है। शायद आप चौंक गये होंगे…लेकिन यह सच है, दूर-दूर से भिखारी यहां आ रहे हैं। छोटे हो या बड़े गरीब हो या पैसे वाले सभी तरह के भिखारी आपको यहां मिल जाऐंगे।
मेरा परिवार हरिद्वार में ही रहता है, मैं दो दिन की छुट्टी पर घर गया हुआ था। घरवालों ने कहा कि कुंभ के समय आये हो, तो गंगा नहायाओ। मेरा तो यही जवाब था कि घर के नल में ही गंगा का पानी आता है, भई घर में ही गंगा नहा लेता हूं…'मन चंगा तो नल में गंगा’, लेकिन धार्मिक मान्यता भी तो हैं, इसलिए सुबह उठकर गंगा नहाने चल दिये।
घर से हरि की पौड़ी के रास्ते में मैंने लगभग 100 से 200 भिखारियों को देखा। मैं एक मंदिर के पास से गुज़र रहा था, तो 15-20 भिखारी उसके बाहर बैठे थे। जिनमें हर उम्र के भिखारी थे। उनमें एक छोटा बच्चा भी था, जिसकी उम्र लगभग 9-10 साल के बीच रही होगी, उसने आशा भरी निगाहों से मुझे देखा, जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा, उसने पैसे मांगने शुरू कर दिए, 5रू. दे दो, 5रू. दे दो…। उसकी मांग सुनकर मुझे लगा वाकई मंहगाई बहुत बढ़ गयी है, तभी वो 1रू. की जगह 5रू. मांग रहा है। तब मैंने उससे पूछा कि 5रू. का क्या करेगा? वह बोला कि, ‘चाय पीनी है।’ मैंने उसे चाय पिलाई और आगे बढ़ गया। थोड़ा आगे बढ़ने पर मेरी नज़र एक बुजुर्ग पर पड़ी, जो गंगा तट पर अपने फटें-पूराने पतले कम्बल के सहारे ठंड से बचने की जद्दोज़हद् में लगे थे। मैं उनके पास गया और उनसे बोला, कि मुझे आपकी कुछ तस्वीर खींचनी है। उन्होंने हामी भरी और मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई में सिखाए गए सभी एंगलों से उनकी तस्वीर खींची और जाने लगा, तभी उन्होंने 10रू. की मांग की। मैंने उनसे पूछा कि बाबा 10रू. का क्या करोगे? उन्होंने बताया कि, ‘बेटा खाना खाऊंगा।’ मैं फिर चौंका कि 5 मिनट में मंहगाई इतनी कम कैसे हो गई कि 10रू में खाना मिल रहा है। पता चला कि पास की ठेली में 10रू में दो पराठे मिलते हैं। बाबा को मैंने पराठे दिए और चल दिया। बस मन में यह सोच रहा था कि इतने भिखारी और मज़लूम लोग हरिद्वार में कहां से आ गए।
एक भिखारी ने बताया कि कुंभ के धंधे का गोल्डन पिरीयड है। उससे बातचीत करने पर लग रहा था, कि वह पढ़ा-लिखा है। उसने बताया कि वह एम.ए. पास है, उसका अपना घर भी है। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि इतना सब कुछ होने के बावजूद वह भीख क्यों मांग रहा है? पूछने पर उसने बताया कि इस धंधे में ज्यादा फ़ायदा है और मेहनत भी कम करनी पड़ती है। उसने यह भी बताया कि उसके कई भिखारी मित्र हैं, जो पढ़े-लिखे हैं और दूर-दूर से ऐसे समय पर हरिद्वार आते हैं। मै भी मन में सोच रहा था कि ‘धन्धा तो अच्छा है।’
खैर मैं आगे बढ़ा और गंगा तट पर गया। वहां पंडित ही पंडित नज़र आए जो रूपयों के हिसाब से पूजा के प्रकार लोगों को बता रहे थे। बाज़ारीकरण और मंहगाई का असर इन पर भी खासा देखने को मिला। मैंने एक सज्जन से पूछा, कि पंडित जी डुबकी लगाने का तो पैसा नहीं लेंगे? उनके आश्वासन के बाद मैंने डुबकी लगाई, पानी काफी ठंडा था। मैं तुरंत बाहर आया और जय गंगा मैया बोल, कपड़े पहनकर जाने लगा, तभी थोड़ी दूर पर मेरी नज़र दो बच्चो पर गई, जो पानी में बार-बार डुबकी लगा रहे थे। उनमें से एक, हाथ में थैली लिये पानी के बाहर बैठा था और दूसरा पानी से कुछ निकालकर उस थैली में डाल रहा था, पास गया तो देखा कि वो पानी से सिक्के निकाल रहे थे। पूछा कि ‘ये क्या है?’ तो वह बोला, ये वही सिक्के हैं जो आप लोग गंगा जी में डालते है। उनकी मासूम निगाहें यही सवाल कर रही थी कि क्या ये सिक्के ऐसे ही नहीं मिल सकते? तभी उनमेसे दूसरा लड़का बोला क्या ये नदी इन सिक्कों से अपना पेट भरती है? लेकिन हम इन सिक्कों से अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं…
उन बच्चों की स्थिति देखकर ज़हन् में यही कश्मकश चल रही थी कि ये देश के भविष्य किस तरह आगे बढ़ेंगे? बेबसी की डुबकी लगाता उनका बचपन हमसे और इस समाज से पूछ रहा था कि ‘करोड़ो-अरबों’ के इस महाकुंभ में कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि चंद सिक्कों के लिए हमें गंगा की इस ठंड से लड़ना ना पड़े?
उसके बाद मैं कई भिखारियों से मिला और बातचीत की। उनमें से कुछ वास्तव में परिस्थितियों के हाथों मजबूर थे और कुछ केवल कमाई मात्र के लिए भीख मांग रहे थे। इस सब को देखकर आस्था का ये महाकुंभ भिखारियों का महाकुंभ ही नज़र आ रहा था। बांकि आपके ऊपर है कि आप इसे क्या समझते हैं?
-हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Friday, April 9, 2010

नम होगा...

अश्को के सागर में, अश्को को बहाकर क्या होगा,

बहाना ही तों अश्क सहरा में बहाओ, कम से कम कमबख्त रेत का रुख तो कुछ नम होगा...

-हिमांशु डबराल

Wednesday, March 17, 2010

‘जनवाणी’ से ‘सत्ता की वाणी’ तक का सफर…


मीडिया पर आये दिन सवाल खड़े हो रहे हैं, विश्वसनीयता भी कम हुई है। बाजारीकरण का मीडिया पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। खबरों और मीडिया के बिकने के आरोपों के साथ-साथ कई नए मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में पत्रकारिता को किसी तरह अपने बूढे क़न्धों पर ढो रहे पत्रकारों के माथे पर बल जरूर दिखायी दे रहे हैं।
भारत में पत्रकारिता का इतिहास बड़ा गौरवशाली रहा है। आजादी के दीवानों की फौज में काफी लोग पत्रकार ही थे, जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक देश व समाज के लिये कार्य किये। लेकिन ये बातें अब किताबों और भाषणों तक ही रह गई हैं। जैसी परिस्थितियों से उस दौर के पत्रकारों को गुजरना पड़ता था, आज के पत्रकारों को भी सच कहने या सच लिखने पर वैसे ही दौर से गुज़रना पड़ता है। सच कहने वालों को सिरफिरा कहा जाता है और उन्हें नौकरी नहीं मिलती, मिल जाये तो उन्हें निकाल दिया जाता है। इसके बावजूद भी कई ऐसे लोग है जो सही पत्रकारिता कर रहे हैं।
2009 के लोकसभा चुनावों में मीडिया का वो स्वरूप देखने को मिला जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी, वो था मीडिया का बिकाऊ होना। हालांकि चुनाव के समय में इस तरह की छुटपुट घटनाएं सामने आती रहती थीं, लेकिन इस बार सारी हदें पार हो गईं। कुछ अखबार व कुछ समाचार चैनलों को छोड़ दें तो पूरा मीडिया बिका हुआ नजर आया। ऐसा होना सच में शर्मनाक था और लोकतन्त्र के लिये दुर्भाग्यपूर्ण। खबरें, यहां तक कि संपादकीय भी पैकेजों में बेचे जाने लगे। एक पृष्ठ पर एक ही सीट के दो-दो उम्मीदवारों को मीडिया विजयी घोषित करने लगा और हद तो तब हो गई जब मीडिया ने पैकेज न मिलने पर प्रबल उम्मीदवार के भी हारने के आसार बता दिये।
पैसे से पत्रकार व पत्रकारिता खरीदी जा रही है। लेकिन जो बिक रहा है शायद वो पत्रकारिता का हिस्सा कभी था ही नहीं। सत्ता में बैठे लोगों की भाषा आज की पत्रकारिता बोल रही है और नहीं तो पैसे की भाषा तो मीडिया द्वारा बोली ही जा रही है। कुछ एक को इन बातों से ऐतराज हो सकता है, लेकिन आंखे बंद करके चलना भी ठीक नहीं है। बाकी मीडिया का जनवाणी से सत्ता की वाणी बनने तक का सफर काफी कुछ इसी तरह चलता रहा।
रही-सही कसर पत्रकारिता में आए नौजवानों ने पूरी कर दी है। एक ओर ज्ञान की कमी, दूसरी ओर जल्दी सब कुछ पा लेने की इच्छा और पैसे कमाने की होड़ ने इन्हें आधारहीन पत्रकारिता की ओर मोड़ दिया है। प्रतिस्पर्धा के दबाव ने भी नौजवानों को पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता करने पर विवश कर दिया है। वैसे दोष उनका भी नहीं है। लाखों रूपए खर्च करने के बाद बने इन डिग्रीधारक पत्रकारों से मूल्यों की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
खैर, हम तो बस इसी ख्याल में बैठे हैं कि मीडिया जल्द ही पुन: जनवाणी बन जायेगा… लेकिन मन यही कहता है कि,
‘दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है गालिब…।’
.
- हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Tuesday, March 16, 2010

नववर्ष मंगलमय हो...


सभी को भारतीय नववर्ष सम्वत् २०६७ विक्रमी ("शोभन" नामक सम्वत्सर) तथा नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनायें।आप सभी के लिए ये नया साल नयी खुशियाँ ले कर आयें और मंगलमय रहे...


-हिमांशु डबराल

Wednesday, March 10, 2010

वो अच्छा है...


जिंदगी में, बंदगी में, आरज़ू में, गुफ़्तगू में,
जो भी मिले वो अच्छा है...
बात में, साथ में, उपहास में या सौगात में,
जो भी मिले वो अच्छा है...
रंग में, संग में और ढंग में,
जो भी मिले वो...
रात में, बरसात में, हाथ में या मुलाकात में,
जो भी मिले वो...
अंधेरों में, उजालों में, चाय के दो प्यालो में
और घटा से उन बालों में,
जो भी मिले वो...
ठोकर में, ढ़ोकर में और जोकर में,जो भी मिले वो...
प्यार में, इजहार में, तकरार में और इस संसार में,
जो भी मिले वो...
गीत में, रीत में, प्रीत में, मीत में या जीत में,
जो भी मिले वो...
सागर में, सहरा में, तेरा में या मेरा में,
जो भी मिले वो...

खेल में, मेल में, जेल में और सेल में,
जो भी मिले वो...

-हिमांशु डबराल
himanshu dabral

क्या हो?

क्या हो जब जिंदगी रंग न लाये,
क्या हो जब जिंदगी के रंग उड़ जाये...
क्या हो जब तुम बदल जाओ,
क्या हो जब हम बदल जाये....
-हिमांशु डबराल

Monday, March 8, 2010

महिला दिवस की शुभकामनाये...

मेरी ओर से सभी महिलाओं को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाये...
फूल नही चिंगारी है,
भारत की ये नारी है...
-हिमांशु डबराल

Friday, March 5, 2010

सिक्के का दूसरा पहलू.....

आज मैने एक ब्लॉग पर एक कहानी पढ़ी...वो लड़का( यहाँ पढ़ें- http://imnindian-bakbak.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html).उस कहानी को पढने के बाद मुझे एक लड़की की कहानी याद आ गयी..जो लिखी है...शायद इसके बाद कुछ लोग इसे पुरुषवादी मानसिकता से लिखा हुआ बताये...लेकिन मै तों बस सिक्के का दूसरा पहलू दिखाना चाहता हूँ....शायद आईना...शायद सच...
.
वो लड़की...
एक लड़की थी...जिसकी शादी तय हुई...उस लड़की के लिए शादी सिर्फ एक बंधन थी...पर घर वालों की मर्ज़ी के आगे वो कुछ नहीं कर पाई...मज़बूरी में उसे शादी के लिए हाँ करना पड़ा...उसका होने वाला पति उसको बहुत प्यार करता था...वो उसके लिए बहुत गिफ्ट ले कर आता था...
उसे हमेशा खुश रखना चाहता था... लेकिन वो उस लड़के के साथ बाहर घुमने जाने में आनाकानी करती थी...उसे डर था की उसके कोई पुराने बॉयफ्रेंड्स न मिल जाये...अगर मिल गये तो उसका कच्चा-चिठ्ठा खुल जायेगा...
उसे आपने कमरे में भी नही आने देती थी...क्यूकी उस कमरे में उसके पुराने बॉयफ्रेंड्स के गिफ्ट्स रखे थे...
उसने इससे पहले कई लडको को धोका दिया था...
और शायद इस लड़के को भी धोका देना चाहती थी...वो ये भी नही जानती थी की उसने कितनी बार खुद को धोखा दिया है...पैसे की चाह ने उसे अन्धा कर दिया था...
उसके लिए रिश्तों का मतलब सिर्फ पैसा और ऐश था...मौज मस्ती का एक जरिया इससे ज्यादा कुछ नही...
उसके लिए बॉयफ्रेंड सिर्फ कार की तरह थे जिसे बोर हो जाने पर बदल दिया जाता है...घर में खड़ा करके नही रखा जाता...और रखा भी जाता है तो भी उसे उपयोग नही किया जाता...घुमा तो नयी गाड़ी में जाता है...
ऐसे में क्या कहा जाये...
किन्तु अब बात पूरी लगती है... "वो लड़का और वो लड़की''...लेकिन सिक्के का तीसरा पहलू भी है...सोचते रहिये...पर्दा जल्द उठेगा

हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Monday, February 15, 2010

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया…

किस मोड़ पे तो नहीं, हां लेकिन एक ऐसे मोड़ पर लाकर जरूर खड़ा कर दिया है, जहां मोहब्बत बाज़ारी नज़र आ रही है। वेलनटाइन वीक चल रहा है, बाज़ार प्यार के तोहफों से लदा हुआ है, हर आदमी की जेब के हिसाब से तोहफे बिक रहे है। ऐसे में एक नया ट्रेण्ड शुरू हो गया है, ‘जितना मंहगा गिफ्ट उतना ज्यादा प्यार’। ये सब आजकल के युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा है पूरे वेलनटाइन वीक को कुछ इस तरह बनाया गया है कि लगभग हर दिन कुछ-न-कुछ गिफ्ट देना ही पड़ता है। क्या आज रिश्ते इन उपहारों के मोहताज़ हो गए है?कुछ लोगों का कहना है कि ये दिन प्यार जाहिर करने के लिए बनाये गए हैं। लेकिन प्यार तो भावनाओं और आत्मा का विषय हैं। एक छोटा सा गुलाब भी दिल की बात कह सकता है जबकि करोड़ों की अंगूठी नहीं।
लेकिन फिर भी ऐसे दिनों की जरूरत क्यों पड़ी? क्या तरक्की के इस दौर में हम रिश्तों की अहमियत भूलते जा रहें हैं? आज प्यार प्यार नहीं, दिखावा नज़र आता है। रिश्‍ते मूल्य खोते जा रहे है, बस शेष रह गयी है तो औपचारिकताएं जो ऐसे दिनों की शक्लों में नज़र आ रही है।
प्यार के इस बदलते स्वरूप को देखकर तो यह लगता है कि आज हम इन ढ़ाई आखर में छुपी भावनाओं को भूलते जा है। ‘इश्क-मोहब्बत’ तो बस किताबों और फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं। आजकल के युवा तो हर वेलनटाइन तो अलग-अलग साथी के साथ मनाते है। प्यार पल में होता है और पल में खत्म भी हो जाता है…ये कैसा प्यार है जो बदलता रहता हैं?
लेकिन ऐसा नहीं है, कि आज के समय में प्यार पूरी तरह से बज़ारी हो गया है। आज भी प्यार शब्द की गहराइयों को समझने वाले लोग है। ऐसे कई मामले सामने आए है, जहां प्यार की खातिर लोग जान तक गंवा बैठे है…प्यार की खातिर ही समाज से लड़ गए, तो कहीं धर्म जाति के बंधनो को भी प्यार ने ही तोड़ा है।
आज का समाज मशीनों से घिरा हुआ है जिससे इंसान भी एक तरह की मशीन ही बनता जा रहा हैं। ऐसे में जरूरत है तो दिल को मशीन बननें से रोकने की और प्यार शब्द के उस एहसास को समझने की जिसे हम भूलते जा रहे है, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब प्यार लफ्ज़ ही दुनिया से खो जाएगा।
और क्या कहूं बस आज के युवाओं के लिये एक कवि की नसीहत याद आती है-

सरल सीखना है, बुरी आदत का,

मगर उनसे पीछा छुड़ना कठिन है।

सरल जिन्दगी में युवक प्यार करना,

सरल हाथ में हाथ लेकर टहलना,

मगर हाथ में हाथ लेकर किसी का,

युवक जिन्दगी भर निभाना कठिन हैं॥

-हिमांशु डबराल

himanshu dabral