Thursday, August 20, 2009

एक दिन की देशभक्ति


आप सोच रहे होगें कि ये एक दिन की देशभक्ति क्या है? ये वो है जो आपके और हमारे अन्दर 15 अगस्त के दिन पैदा होती है और इसी दिन गायब हो जाती है। जी हाँ हम लोग अब एक दिन के देशभक्त बनकर रह गये है।
एक समय था जब हर व्यक्ति के अन्दर एक देशभक्त होता था, जो दो के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था। लेकिन आज के इस आधुनिक समाज को न जाने क्या हो गया है। देशभक्ति तो बस इतिहास के पन्नो में दफन हो कर गयी है। आज हर तीज त्योहारों की ड्राइविंग सीट पर बाजार बैठा है। और हमारा स्वतन्त्रता दिवस भी बाजार के हाथों जकड़ा नजर आ रहा है।15 अगस्त भी बाजार के लिये किसी दिवाली से कम नहीं आपको बाजार मे छोटेबड़े तिरंगे, तिरंगे के रंग वाली पतंगे और न जाने क्या क्या स्वतन्त्रता दिवस के नाम पर बिकता नजर आ जायेगा। जिसको देखों अपने हाथ में तिरंगा लिये धूमता रहता हैं… भले ही उसके मन मे तिरंगे के लिये सम्मान हो न हो… खैर वो भी क्या करे दिखावे का जमाना है। यदि यही सब चलता रहा तो आने वाली पी़ढी शायद ही भगत सिंह, चन्द्र्शेखर के बारे मे जान पायेगी…
15 अगस्त का एक वाकया मुझे याद आता है मैं घर से आजादी की वर्षगांठ मनाने जा रहा था। मैने कुछ बच्चों को हाथ में तिरंगा लिये स्कूल जा रहे थे। तभी एक बच्चे के हाथ से तिरंगा गिर गया। भीड़ की वजह से वो उसे उठा नहीं पा रहा था। तिरंगे के उपर से न जाने कितने लोग गुजर गये… लेकिन किसी ने उसे उठाया नहीं। आजादी के प्रतीक का यह अपमान देख कर मुझे शर्म सी महसुस हो रहीं थी… पहले जाकर तिरंगे को उठाया और आगे जा रहे बच्चों को दिया… दूसरा बच्चा बोला ये तो गन्दा हो गया है… 5 रूपये का ही है… नया ले लेगें…
हमने अपने बच्चों को तो देशभक्ति और तिरंगे का सम्मान करना नहीं सिखाया। लेकिन वहां से गुजर रहे और लोगो को देख कर लग रहां था कि हम खुद भी नहीं समझे… आज उसी तिरंगे को उठाने में हमे शर्म महसूस हो रही है जिसे फहराने के लिये शहीदों ने हंसते हंसते अपनी जान दे दी।
हमारे नेताओं को भी देशभक्ति ऐसे ही मौकों पर याद आती है। ऐसे ही दिन शहीदों की तस्वीरें निकाली जाती है… उन पर मालायें चढाई जाती है… देशभक्ति के राग अलापे जाते है। उसके बाद शहीदों की ये तस्वीरें किसी कोने में धूल फॉकती रहती हैं। इनकी सुध तक नही ली जाती। ये कैसी देशभक्ति है, केवल शहीदों के नाम पर स्मारक बनवाना और उस पर माला चढाना ही काफी नहीं है। जिस तरह माली की हिम्मत नहीं कि वो फूले खिला दे, उसका काम तो पौधे के लिये उचित माहौल तैयार करना है… उसी तरह हमें मिलकर देशप्रेम का ऐसा माहौल तैयार करना होगा की सबके मन में देशभक्ति रूपी फूल हमेसा खिलता रहे। ये नेता भी आजादी के असली मायनों को समझें और हम भी समझें तभी ये आजादी हमारे लिये सार्थक होगी।
हम सब अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। हम अपने परिवार के लिए तो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते है लेकिन हम भूल जाते है कि दो के प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं, जिन्हे हममें से कोई भी नही निभाना चाहता। हर कोई अपने में खोया है, पता नहीं दो के बारे में कोई सोचता भी है या नहीं, मै और कुछ कहना नहीं चाहता… लेकिन एक भोर याद आ रहा है
बर्बाद ए गुलिस्तां के लिये एक शाख पे उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अन्जामे गुलिस्तां क्या होगा?
-हिमांशु डबराल

Sunday, August 2, 2009

शायद पत्रकार हूँ मैं....

क्या कहूँ कौन हूँ मैं???
शायद इंसानों की भीड़ का हिस्सा,
या उस भीड़ में सबसे जुदा
शब्दों का काश्तकार हूँ मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
एक आईना जो बहुत कुछ दिखता है,
कभी हकीकत तो कभी झूठ से भी मिलवाता है,
कभी-कभी तो धुंधुला भी पड़ जाता है,
उस आईने का व्यवहार हूँ मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
लोकतंत्र में रहते हुए
स्वयं को एक स्तम्भ कहते हुए,
जनता के इस तंत्र का पहरेदार हूँ मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
बाजारीकरण के इस दौर में
आगे बढ़ने की होड़ में,
टीरपी की दौड़ में,
पत्रकारिता से समझौता करता
एक नया बाज़ार हूँ मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
फिर भी पत्र को एक आकार देता हूँ
किसी को अन्धा तों किसी को आखे चार देता हूँ,
किसी को काली दुनिया तों किसी को रंगीन स्वप्नहार देता हूँ,
नए नए समाचारों के बीच,
एक अलग विचार हूँ मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
लकिन कभी खुद को कोसता,
अपने भीतर पत्रकारिता की लौ को खोजता,
रोज नई आधियों के बीच डगमगाती उस लौ का,
हिस्सेदार हु मैं,
शायद पत्रकार हूँ मैं...
- हिमांशु डबराल