Thursday, September 24, 2009

बदलते रिश्ते

रिश्ते ये रिश्ते कितने अजीब ये रिश्ते ...
कभी बनते, कभी बिगड़ते ये रिश्ते
तों कभी शांत रहते ये रिश्ते
अलग-अलग चहरे में सामने आते
कभी माँ की, कभी पिता की याद दिलाते
तो कभी बहन बनकर, कभी भाई बनकर सामने आते ये रिश्ते
दोस्त बनकर हमे हसाते और कभी रूलाते ये रिश्ते...

कुछ रिश्ते बड़े अजीब होते है
हँसते-हँसते हम कभी रोते हैं,
शायद वो रिश्ते हमे बड़े अजीज होते हैं...

क्या कहूँ उस रिश्ते को, जो कभी सब रिश्तों से बड़ा हो जाता है,
कभी-कभी तों सब रिश्तों के सामने दिवार बन खड़ा हो जाता है,
है हम सोचते है किसे पाए किसे खो जाए...
फिर सोचता है मैं
कितने बदल जाते है ये रिश्ते
कभी दूर तो कभी पास आते है ये रिश्ते,
कभी रिश्तों को ही भुलवाते है ये रिश्ते,
कभी आपस में उलझ जाते है ये रिश्ते,
तभी शायद कुछ अजीब है ये रिश्ते...
रिश्ते ये रिश्ते, कितने आजीब ये रिश्ते...



-हिमांशु डबराल

Monday, September 14, 2009

हिंदी हूँ मैं...

कल रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मै आपसे करने पर विवश हो गया हुं...सपने में मै हिंदी दिवस मानाने जा रहा था तभी कही से आवाज आई...रुको! मैने मुड़ के देखा तों वहा कोई नही था...मै फिर चल पड़ा...फिर आवाज आयी...रुको! मेरी बात सुनो...मैने गौर से सुना तो लगा की कोई महिला वेदना भरे स्वरों में मुझे पुकार रही हो...मैने पूछा आप कौन हो? जबाब आया...मैं हिंदी हुं... मैने कहा कौन हिंदी? मै तो किसी हिंदी नाम की महिला को नही जानता...दोबारा आवाज आई - तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए??? मेरे तों जैसे रोगटे खड़े हो गए...मैने कहा मातृभाषा आप! मै आपको कैसे भूल सकता हूँ...फिर आवाज आयी 'जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है'...
फिर हिंदी ने बोलना शुरू किया- 'तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न??? मैने कहा ऐसा नही है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है... हिंदी ने कहा - नही चाहिए ऐसा सम्मान... मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा की हिन्दुस्तानियों को हिंदी दिवस मानना पड़ रहा है...

उसके बाद हिंदी ने जो भी कहा वो वो इन पक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है...

हिंदी हूँ मैं! हिंदी हूँ मैं..
भारत माता के माथे की बिंदी हूँ मै

देवों का दिया ज्ञान हूँ मै,
घट रही वो शान हूँ मै,
हिन्दुस्तानियों का इमान हूँ मै॥
इस देश की भाषा थी मै,
करोडो लोगो की आशा थी मै

हिंदी हूँ मैं! हिंदी हूँ मैं..
भारत माता के माथे की बिंदी हूँ मै

सोचती हूँ शायद बची हूँ मै,
किसी दिल में अभी भी बसी हूँ मै,
पर अंग्रेजी के बीच फसी हूँ मै...

न मनाओ तुम मेरी बरसी,
मत करों ये शोक सभाएं,
मत याद करो वो कहानी...
जो नही किसी की जुबानी

सोचती थी हिंद देश की भाषा हूँ मै,
अभिव्यक्ति की परिभाषा हूँ मैं,
सच्ची अभिलाषा हूँ मैं,
लेकिन अब निराशा हूँ मैं...

जी हाँ हिंदी हूँ मैं
भारत माँ के माथे की बिंदी हूँ मैं...
इस सपने के बाद मै हिंदी दिवस के किसी कार्यक्रम में नही गया...घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा की क्या आज सच में हिंदी का तिरस्कार हो रहा हैं??? क्या हमे अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है??? शायद नही...
मेरा तो यही मानना है की आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो...और अगर ऐसा सब करे तो हर दिन हिंदी दिवस होगा...
जय हिंदी...
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-हिमांशु डबराल

Thursday, September 10, 2009

रंग

रंग बदल जाते है धुप में, सुना था
फीके पड़ जाते है, सुना था
पर उड़ जायेंगे ये पता न था!
हाँ ये रंग उड़ गए है शायद...
जिंदगी के रंग इंसानियत के संग,
उड़ गए है शायद...

अब रंगीन कहे जाने वाली जिंदगी, हमे बेरंग सी लगती है,
शक्कर भी हमे अब फीकी सी लगती है...

कहा है वो रंग???
जो रहेते थे रिश्तो के संग
बाप की डाट और माँ के दुलार के रंग,
खेलने के घाव और बचपन की नाव के रंग,
पडोसी की चाय के, बुजुर्गो के साये के रंग,
हाथों में वो हाथ, दोस्तों के साथ के वो रंग,
उड़ गए है शायद...

तितलियों को पकड़ते नन्हे हाथो के रंग,
बच्चो के खेल और बडो के मेल के वो रंग
चटपटी सी चाट, घर की पुरानी खाट के रंग,
मानिंद चलती हवाओ में खुशबु के रंग,
उड़ गए है शायद...

कोशिश करो की ये रंग उड़ने न पाए
क्योकि ये रंग उड़ गए तों...
फिर न रहेगी रंगीन मुस्कान, रंगीन यौवन, रंगीन जिंदगी॥
छोटी-छोटी खुशियों की वो ताल,
छीन न जाये उड़ न जाए, उड़ न जाये...
रंग भरो जिंदगी में जिंदगी के,
संग उडो जिंदगी के रंगों में॥
हसों और मुस्कुराओ और गाओ
रंगी समां, रंगी जहा बनाओ...

-हिमांशु डबराल

Tuesday, September 8, 2009

सच बोलने की सजा ...

आज फिर मैंने सच बोलने की सजा पाई...

उस शाम,

बैठा था माँ की गोद में सर रखकर,

माँ सहला रही थी आँचल से मेरा माथा कि,

हौले से पूछ बैठी...

बेटा , आगे का क्या है इरादा ?

मेरा तन - मन पुलक उठा,

एक अजीब से जोश से भर उठा,

और मै हौले से बोल उठा,

माँ ...!

मेरा मन नहीं लगता प्रौद्योगिकी में,

गणित के सूत्रों और सिद्धांतों की भौतिकी में,

मेरा दिल तो लगा है राष्ट्रप्रीति में,

इसलिए हे माँ मुझे जाना है राजनीति में...

माँ तुनक उठी,

मुझ पर जोरों से बिफर उठी,

हल्के गुस्से में बोल उठी,

क्या इसीलिए पढाया तुझे विषम परिस्थिति में ?

या फिर गोबर भरा है तेरी मति में,

बाबू, चाहे जिंदगी गुजार लो खेती में,

मगर दोबारा मत कहना कि,

मुझे जाना है राजनीति में ...

इतना कहकर माँ ने मुझे हल्की सी चपत लगाईं,

मेरी आँखें न जाने क्यों डबडबा आई,

और इस तरह एक बार फिर,

मैंने सच बोलने की सजा पाई ...!


सर्वाधिकार सुरक्षित @ 'जय'

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