Monday, October 26, 2009

रुला दिया है मुझे...


तेरी यादों की चादर ओढे मै सो तो रहा था,
पर ख्वाबो में तेरी यादों ने फिर जगा दिया
है मुझे...

मेरे दिल ने तुझे बेवफा भी न कहा था,
पर मेरे अहसासों ने मुझसे चुरा लिया
है तुझे...

अब इन धडकनों का मैं क्या करू जो तेरे नाम से धड़कती है,
मैंने तों जीवन की डोर को ही थमा दिया
है तुझे...

वीरानियों में, वीरां मकां में मैं रह तो रहा था,
तेरे खलूस ने वीरां बना दिया
है मुझे...

और क्या कहूँ तुझसे ऐ दिलनशी,
तेरी खुशबु ने मेरे जहाँ को महका दिया...

अँधेरे रास्तों में मै चल तो रहा था,
तेरे नूर ने सारे रास्ते को जगमगा दिया...

भीड़ के चहरों में मै तुझे ढूंढ़ तो रहा था,
लेकिन हर चहरे ने अपनालिया है
तुझे...

इश्क के तूफां से मै गुजर तो रहा था,
पर तेरी हवा ने रास्तों से भटका दिया
है मुझे...

तेरे झूठे वादों पर मै जी तो रहा था,
तेरी बेवफाई ने पागल बना दिया
है मुझे ...

मै अपनी सिसकियों पे मुस्कराहट का पर्दा डाल तो रहा था,
पर तेरी हसीं ने फिर रुला दिया
है मुझे...

-हिमांशु डबराल

himanshu dabral


Sunday, October 18, 2009

दिवाली या दिवाला ?

दीपावली’, एक पावन त्यौहार। जिसके आते ही दीप जलाये जाते हैं, खुशियां मनायी जाती हैं, तरह-तरह कीमिठाईयां, पकवान, पटाखे और नये कपड़े खरीदे जाते हैं, घरों को साफ किया जाता है। लेकिन आज दिवाली आनेपर आम लोगों के चेहरे उतरे नजर रहे हैं। कारण है महंगाई, महंगाई ने आज आम आदमी की कमर तोड़ कररख दी है।

दिवाली आते ही जेबें ढीली होने का डर सताने लगता है। सभी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। त्यौहार आने से पूरेघर का बजट बिगड़ जाता है पर करें भी तो क्या करें। बढ़ती मंहगाई ने अमीर गरीब के बीच की खाई को औरगहरा कर दिया है। अब गरीब आदमी की तो मन गई दिवाली। वो तो सिर पकड़कर बैठ जाता है कि दिवाली कैसेमनाए। और अगर मंहगाई से बच गए तो नकली मिठाई, नकली पटाखे आदि आपका दीवाला निकाल देंगे और रही-सही कसर प्रदूषण और शराबी लोग पूरी कर देंगे। अब आप ही सोचिए
दिवाली या दिवाला

-हिमांशु डबराल

Monday, October 12, 2009

युवराज के नाटक...


आप सोच रहे होंगे कि युवराज कौन? हम इस देश की सत्तारूढ़ पार्टी के युवराज की बात कर रहे हैं। पुराने समय में राजा-महाराजा हुआ करते थे और उनके पुत्रों को युवराज कहा जाता था। रजवाड़े खत्म हो गए लेकिन आज के आधुनिक दौर में भी युवराज होते हैं। अब युवराज हैं तो भइया सुरक्षा भी ज्यादा चाहिए। जहां जाते हैं पूरा काफिला साथ चलता है। उनकी सुरक्षा के कारण आम जनता को बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और राहुल बाबा हीरो बन जाते हैं। किसी गांव में गए और गांव में सुरक्षाबलों का तांता लग जाता है। लोगों को अपने ही घरों को जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

युवराज हैंडपम्प से नहा लें तो यह खबर है और हजारों लोग यमुना के जहरीले पानी से नहाते हैं वो खबर नहीं है। ट्रेन से जाएं तो यह खबर है और गांवों में लोग आज भी कोसों पैदल चलने को मजबूर हैं, यह खबर नहीं है। ऐसी ही न जाने कितनी बातें हैं जो युवराज के जाने से खबर बन जाती है। देश की मूलभूत समस्याओं को उजागर करने की जगह मीडिया राहुल गांधी के नाटकों को तरजीह दे रहा है।

कुछ दिन पहले राहुल गांधी जेएनयू पहुंचे। लाल टापू में उनके जाने से हवाएं गर्म हो गईं। जगह-जगह पोस्टर लगाए गए। कहीं पोस्टर में राहुल चाय पीते नजर आए तो कहीं युवराज के आगमन व स्वागत के पोस्टर थे। लाल टापू का यह दौरा एनएसयूआई के ही लोगों द्वारा कराया गया। युवराज के आने से पहले जेएनयू छावनी में तब्दील कर दिया गया। इतनी सुरक्षा तो तब भी नहीं दिखी थी जब प्रधानमंत्री यहां आए थे लेकिन जब राहुल गांधी वामपंथिओं के गढ़ पहुंचे तो उनके लिए 600 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी थे। छात्रों से ज्यादा तो सुरक्षाबल नजर आ रहा था। अब सवाल यह उठता है कि जो सुरक्षा प्रधानमंत्रियों के लिए भी नहीं होती तो राहुल के लिए क्यों। न तो राहुल देश के प्रधानमंत्री हैं और ना ही सरकार में मंत्री। केवल गांधी होने के कारण क्या इतनी सुरक्षा सही है?

जेएनयू में कई छात्रों के तीखे तेवरों का सामना भी राहुल को करना पड़ा। शुरुआती औपचारिक भाषणों के बाद राहुल जैसे ही मंच पर पहुंचे, सामने बैठे स्टूडेंट्स के एक ग्रुप ने राहुल को काले दुपट्टे दिखाते हुए नारे लगाने शुरू किए- ‘84 के दंगाइयों को एक धक्का और दो। फेक एनकाउंटर करने वालों को एक धक्का और दो।’ इन सबके बीच राहुल ने बोलना शुरु किया और छात्रों के सवालों के जवाब भी दिए। एक छात्र ने सवाल पूछा कि उसने फ्रेंच भाषा में बी.ए. किया है और उसे तमाम एमएनसी से भी ऑफर हैं लेकिन प्राइवेट नौकरी में सिक्युरिटी नहीं है इसलिए वो सरकार के साथ काम करना चाहता है। राहुल ने उस छात्र को मंच पर बुलाकर गले लगाया और एनएसयूआई के नेताओं से कहा कि इनका बायोडेटा ले लीजिये, देखते हैं। लेकिन राहुल जी इस देश में लगभग 4 करोड़ से ज्यादा शिक्षित युवा बेरोजगार हैं; किस-किस का बायोडेटा लेंगे राहुल जी? चलिए शायद इस प्रकरण से एक बेरोजगार को रोजगार मिल जाए…।

कभी दलित के यहां रात गुजारना तो कभी भीड़ में जाकर बात करना और इसके कारण उनके सुरक्षा बल आम लोगों को परेशान करते हैं। भीड़ को हटाने के लिए धक्का मारा जाता है। अरे युवराज जी आप आम आदमी की मुश्किलें सुलझाने जाते हैं या बढ़ाने? चलिये युवराज जी बातें बनाने में तो आप माहिर हैं लेकिन बातों की जगह जमीनी स्तर पर कुछ कार्य भी करें तो अच्छा होगा।।

-हिमांशु डबराल

Sunday, October 11, 2009

गालियां या फैशन


एक समय था जब भारतीय समाज को उसकी सभ्यता और मधुभाषिता के लिए जाना जाता था। समाज में कोई किसी के लिए अपशब्दों का प्रयोग नहीं करता था और अगर कोई बोल भी दे तो उसे समाज में बुरा माना जाता था। धीरे-धीरे समय बदला लेकिन गालियों को सामाजिक रूप से कभी स्वीकारा नहीं गया। लेकिन आज के समाज को ना जाने क्या हो गया है? गालियों को धीरे-धीरे सामाजिक रूप से स्वीकारा जा रहा है। खासकर महानगरों में गालियां देना एक आम बात हो गई है और यह स्टेटस सिंबल बनतीं जा रहीं हैं, जो गाली नहीं देता वो गांवों का समझा जाता है। स्कूलों के बच्चों को ही देखा जाए जो प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं, आपको गालियां देते नजर आ जाएंगे और अगर आप उन्हें टोकेंगे तो आप पर भी गलियों की बौछार शुरू हो जाएगी। आजकल बातचीत में प्रभाव भी गालियों से ही पड़ता हैं। इसे क्या कहा जाए? क्या हमारा समाज मानसिक रूप से दिवालिया होता चला जा रहा है?लड़के तो छोड़िए लड़कियां भी गालियां देने में पीछे नहीं हैं। आजकल के युवा गालियां देने के बाद शर्मिंदगी के बजाय अपने आप को बड़ा गर्वान्वित महसूस करते हैं। ये लोग आते तो यहां पढ़ने के लिए हैं और शायद ये जहां से आते हैं वहां भी गालियां सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं हैं। फिर भी यहां आकर गालियां देते हैं। कारण पूछा जाए तो इनके अपने तर्क हैं। कोर्इ्र कहता है कि ये सब तो चलता है…, अरे गालियां तो सभी देते हैं…, दिक्कत क्या है…? यह तो फैशन है, भाई। ऐसे जबावों को सुनकर बड़ा अजीब लगता है। आज का युवा कहीं भी गाली देने से नहीं हिचकिचाता, चाहे वो स्कूल-कॉलेज हों या कोई भी सार्वजनिक स्थल।गालियों को फैशन बनाने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है – आप, हम या हमारा समाज? शायद हमें हर बात को हल्के में लेने की आदत हो गई है। चलो कोई बात नहीं…, हम क्या करें…, बिगड़ैल है…, हमें तो नहीं दे रहा…आदि कहकर बात टाल देते हैं। कभी हम किसी को टोकते नहीं हैं। यहां तक कि महिलाओं और बच्चों के सामने गाली देने वाले को भी नहीं टोका जाता।अभी ये हाल है तो हम आने वाली पीढ़ियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं। कहीं गालियों का चलन न हो जाए इसके लिए मिलकर प्रयास करना होगा ताकि गालियों को सामाजिक मान्यता न मिल पाए और गाली देने वालों को भी समझाना होगा कि ये फैशन नहीं मानसिक दिवालियापन है। बाकी आप के ऊपर है कि आप क्या समझते हैं-

गालियां या फैशन?

-हिमांशु डबराल