Saturday, December 29, 2012

मैं दामनी हूँ...जी हाँ दामनी...

आप मेरे जीने की दुआ न मांगें क्युकि मैं अब नही हूँ...वैसे तो मैं उसी दिन मर गयी थी जिस दिन उन दरिंदों ने मेरी अस्मिता से खिलवाड़ किया था... अभी तक बस सांसे चल रही थी... अब वो भी नही हैं... क्या करती जी के भी??? ऐसे समाज में जहाँ किसी भी लड़की के साथ कुछ भी हो सकता है...मेरी मौत से बहुत फर्क पड़ेगा न आपको? लेकिन कुछ दिनों बाद आप सब मुझे भूल जाओगे...वैसे भी आप सबकी याददास्त बहुत कमज़ोर है...कुछ दिनों में ही बड़ी से बड़ी बात भूल जाते हो। लेकिन मैं नही चाहती की आप मुझे भूले, याद रखें मुझे...मैं आपको हर पल याद दिलाती रहूंगी की आप लोगों के बीच मौजूद दरिंदों ने ही मेरे साथ ऐसा किया...मेरे साथ तो छोडिये इस देश में न जाने कितनी दामनी ऐसे ही हैवानों की हवस का शिकार बनती हैं...यहाँ तो मासूम बच्चियों पर भी हैवानों की वहशी निगाहें रहती है...
अच्छा लगा की आप मेरे लिए आये, लाठियां भी खायी, नारे भी लगाये...लेकिन मैं चाहती हूँ की आप मेरे जैसी हर दामनी के लिए ऐसे ही आगे आयें और उसे इंसाफ दिलाएं। वैसे तो उन लोगों को ख़त्म करके कुछ नही होने वाला...खत्म करना तो उस मानसिकता को खत्म करिए जो उनलोगों को ऐसा करने से लिए उकसाती हैं। तभी शायद मुझे और न जाने मेरी जैसी कितनी दामनीयों को सुकून मिलेगा। 

जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती,
जिस्म मिट जाने से इंसान नही मरते,
धड़कने रुकने से अरमान नही मरते,
सांस थम जाने से ऐलान  नहीं मरते,
और.... होठ जम जाने से फरमान नही मरते।।