Wednesday, September 14, 2011

हिंदी हूँ मैं...


एक रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मै आपसे करने पर विवश हो गया हुं...सपने में मै हिंदी दिवस मानाने जा रहा था तभी कही से आवाज आई...रुको! मैने मुड़कर देखा तों वहा कोई नही था...मै फिर चल पड़ा...फिर आवाज आयी...रुको! मेरी बात सुनो...मैने ग़ौर से सुना तो लगा की कोई महिला वेदना भरे स्वरों में मुझे पुकार रही हो...मैने पूछा आप कौन हो? जबाब आया...मैं हिंदी हुं... मैने कहा कौन हिंदी? मै तो किसी हिंदी नाम की महिला को नही जानता...दोबारा आवाज आई - तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए??? मेरे तों जैसे रोगटे खड़े हो गए...मैने कहा मातृभाषा आप! मै आपको कैसे भूल सकता हूँ...फिर आवाज आयी 'जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है'...

फिर हिंदी ने बोलना शुरू किया- 'तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न??? मैने कहा ऐसा नही है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है... हिंदी ने कहा - नही चाहिए ऐसा सम्मान... मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा की हिन्दुस्तानियों को हिंदी दिवस मानना पड़ रहा है...

उसके बाद हिंदी ने जो भी कहा वो वो इन पक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है...

हिंदी हूँ मैं! हिंदी हूँ मैं..

भारत माता के माथे की बिंदी हूँ मै

देवों का दिया ज्ञान हूँ मै,

घट रही वो शान हूँ मै,

हिन्दुस्तानियों का इमान हूँ मै॥

इस देश की भाषा थी मै,

करोडो लोगो की आशा थी मै

हिंदी हूँ मैं! हिंदी हूँ मैं..

भारत माता के माथे की बिंदी हूँ मै

सोचती हूँ शायद बची हूँ मै,

किसी दिल में अभी भी बसी हूँ मै,

पर अंग्रेजी के बीच फसी हूँ मै...

न मनाओ तुम मेरी बरसी,

मत करों ये शोक सभाएं,

मत याद करो वो कहानी...

जो नही किसी की जुबानी

सोचती थी हिंद देश की भाषा हूँ मै,

अभिव्यक्ति की परिभाषा हूँ मैं,

सच्ची अभिलाषा हूँ मैं,

लेकिन अब निराशा हूँ मैं...

जी हाँ हिंदी हूँ मैं

भारत माँ के माथे की बिंदी हूँ मैं...

इस सपने के बाद मै हिंदी दिवस के किसी कार्यक्रम में नही गया...घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा की क्या आज सच में हिंदी का तिरस्कार हो रहा हैं??? क्या हमे अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है??? शायद नही...

मेरा तो यही मानना है की आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो...और अगर ऐसा सब करे तो हर दिन हिंदी दिवस होगा...

जय हिंदी...


-हिमांशु डबराल

(2009 में हिंदी दिवस के दिन लिखा लेख और कविता)

Tuesday, September 13, 2011

तुम पास तो हो मेरे....

तुम पास तो हो मेरे, लेकिन फासले फिर भी है,

मंजिल पर खड़ा हूँ मै, मगर रास्ते फिर भी है...

तुम पास तो हो मेरे....



यूँ तो चांदनी भी है, रौशनी भी है,

लेकिन दिलों में अँधेरे, फिर भी है...

तुम पास तो हो मेरे...



- हिमांशु डबराल

Monday, August 15, 2011

एक दिन की देशभक्ति...

आज 15 अगस्त है...आज़ादी का दिन...कल से ही मोबाईल पर मेसेज आने शुरू हो गए थे और आज तों इन्बोक्स भर गया..कोई शहीदों की दुहाई दे रहा है तो कोई आज़ाद भारत की उपलब्धिया गिना रहा है...कुछ लोग शर्म के मारे मेसेज कर रहे थे क्यूकी वो रोज डे, फलाना डे, ढिमका डे सबको विश करते है...और कुछ तो केवल इसलिए मेसेज कर रहें है की उन पर आरोप न लगे की वो देशभक्त नही है...लेकिन देशभक्ति दिखने का ये अच्छा तरीका है...वाह...मैने किसी को मेसेज नही बेझा...न मैं किसी कार्यक्रम में गया...क्या करता जाकर भी...बचपन से जाता रहा हुं...स्कूल में जाते थे तो लड्डू मिलता था...नाम था आज़ादी का लड्डू , वो लड्डू खाने से पहले देश भक्ति के गाने गए जाते थे...भाषण सुनाये जाते थे...उस समय आज़ादी का मतलब नही पता था...लेकिन आज जब पता है तो सोचता हुं की हम सच में आज़ाद है??? शायद नही...हम शायद आज भी गुलाम हैं..मानसिक रूप से...तभी तो आज़ादी के असली मायनो को आज तक नहीं समझ पाए...
वैसे आप सोच रहे होगें कि ये एक दिन की देशभक्ति क्या है? ये वो है जो आपके और हमारे अन्दर 15 अगस्त के दिन पैदा होती है और इसी दिन गायब हो जाती है। जी हाँ हम लोग अब एक दिन के देशभक्त बनकर रह गये है।
एक समय था जब हर व्यक्ति के अन्दर एक देशभक्त होता था, जो देश के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था। लेकिन आज के इस आधुनिक समाज को न जाने क्या हो गया है। देशभक्ति तो बस इतिहास के पन्नो में दफन हो कर रह गयी है। आज हर तीज त्योहारों की ड्राइविंग सीट पर बाजार बैठा है। और हमारा स्वतन्त्रता दिवस भी बाजार के हाथों जकड़ा नजर आ रहा है।15 अगस्त भी बाजार के लिये किसी दिवाली से कम नहीं आपको बाजार मे छोटेबड़े तिरंगे, तिरंगे के रंग वाली पतंगे और न जाने क्या क्या स्वतन्त्रता दिवस के नाम पर बिकता नजर आ जायेगा। जिसको देखों अपने हाथ में तिरंगा लिये धूमता रहता हैं… भले ही उसके मन मे तिरंगे के लिये सम्मान हो न हो… खैर वो भी क्या करे दिखावे का जमाना है...दिखावा नही करेगा तो समाज में अपनी देशभक्ति कैसे दिखायेगा...अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाली पी़ढी शायद ही भगत सिंह, चन्द्र्शेखर के बारे मे जान पायेगी…
15 अगस्त का एक वाकया मुझे याद आता है आज से कुछ साल पहले मैं घर से आजादी की वर्षगांठ मनाने जा रहा था। कुछ बच्चे हाथ में तिरंगा लिये स्कूल जा रहे थे। तभी एक बच्चे के हाथ से तिरंगा गिर गया। भीड़ की वजह से वो उसे उठा नहीं पा रहा था। तिरंगे के उपर से न जाने कितने लोग गुजर गये… लेकिन किसी ने उसे उठाया नहीं। आजादी के प्रतीक का यह अपमान देख कर मुझे शर्म सी महसुस हो रहीं थी… मैने पहले जाकर तिरंगे को उठाया और आगे जा रहे बच्चे को दिया… दूसरा बच्चा बोला ये तो गन्दा हो गया है… 5 रूपये का ही है… नया ले लेगें…ये बात सुनकर हैरानी हो रही थी...मैने उससे बोला की बेटा ऐसा नही कहते....वो बच्चे चले गए लेकिन मै वही खड़ा रहा...यही सोचता रहा की हमने अपने बच्चों को तो देशभक्ति और तिरंगे का सम्मान करना नहीं सिखाया। लेकिन वहां से गुजर रहे और लोगो को देख कर लग रहां था कि हम खुद भी नहीं समझे… आज उसी तिरंगे को उठाने में हमे शर्म महसूस हो रही है जिसे फहराने के लिये शहीदों ने हंसते हंसते अपनी जान दे दी।
मै घर वापस आ गया...मुझे लगा की एक दिन जा कर ऐसे कार्यक्रम में शिरकत करना कोई देशभक्ति नही...केवल दिखावा है...ढकोसला है...अपने अंदर के देश भक्त का गला तो हम पहले ही घोट चुके है...फिर किस बात का आज़ादी का जश्न??? उल्टा ऐसा कर हम उन शहीदों का और उनकी शहादत का अपमान कर रहे है...
हमारे नेताओं को भी देशभक्ति ऐसे ही मौकों पर याद आती है। ऐसे ही दिन शहीदों की तस्वीरें निकाली जाती है… उन पर मालायें चढाई जाती है… देशभक्ति के राग अलापे जाते है। उसके बाद शहीदों की ये तस्वीरें किसी कोने में धूल फॉकती रहती हैं। इनकी सुध तक नही ली जाती। ये कैसी देशभक्ति है? केवल शहीदों के नाम पर स्मारक बनवाना और उस पर माला चढाना ही काफी नहीं है। जिस तरह माली की हिम्मत नहीं कि वो फूले खिला दे, उसका काम तो पौधे के लिये उचित माहौल तैयार करना है… उसी तरह हमें मिलकर देशप्रेम का ऐसा माहौल तैयार करना होगा की सबके मन में देशभक्ति रूपी फूल हमेशा खिलता रहे। ये नेता भी आजादी के असली मायनों को समझें और हम भी समझें तभी ये आजादी हमारे लिये सार्थक होगी।
हम सब अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। हम अपने परिवार के लिए तो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते है लेकिन हम भूल जाते है की देश के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं, जिन्हे हममें से कोई भी नही निभाना चाहता। हर कोई अपने में खोया है, पता नहीं कोई देश के बारे में कोई सोचता भी है या नहीं, मै और कुछ कहना नहीं चाहता… लेकिन एक शेर याद आ रहा है-

बर्बादी ए गुलिस्तां के लिये एक शाख पे उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अन्जामे गुलिस्तां क्या होगा?

-हिमांशु डबराल

(पुराना लेख लेकिन आज भी यही विचार है, आज भी यही आलम है)

Friday, August 12, 2011

परछाई थी...


जो मिला था वो अब भी दिल के करीब है,

जो गया शायद वो उसकी परछाई थी...

- हिमांशु डबराल

Sunday, April 10, 2011

फिर से...

फिर से वो दिन लौट कर क्यों नही आते,

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...


यूँ तो दिन भी रोज आते हैं और रातें भी,

लेकिन वो रातें, वो दिन फिर नही आते...

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...


चाय पीने दूर तक चले जाना,

अचानक से घुमने का प्लान बनाना,

घुमने के लिए घर में झूट बोल कर आना,

अब तो वो दोस्त बहाने भी नही बनाते...

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों...


वो पहाड़ों में घूमना, वो मस्ती में झूमना,

लड़ के एक दुसरे से यूँ ही मुह मोड़ना,

वो लड़ना झगड़ना, वो अजीब सी बातें,

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...


कभी एक दुसरे के लिए मरने को तैयार हो जाना,

कभी आपस में ही दुश्मन बन जाना,

कभी यूँ ही हंसाते, कभी यूँ ही रुलाते,

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...


अब तो वो अपनी नयी दुनिया में खो गये है,

पहले अपने थे हम, अब बेगाने हो गये है,

पहले तो बात किये बगैर रह नही सकते थे,

अब तो उनके पयाम भी नही आते...

फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...


-हिमांशु डबराल

Monday, February 14, 2011

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया...

किस मोड़ पे तो पता नहीं, हाँ लेकिन एक ऐसे मोड़ पर लाकर ज़रूर खड़ा कर दिया है, जहाँ मोहब्बत बाज़ारू नज़र रही है। वेलेन्टाइन वीक चल रहा है। बाज़ार, प्यार के तोहफ़ों से सजा हुआ है, तोहफों की भरमार है बशर्ते आपकी जेब में दाम हो! वैसे भी नया ट्रैण्ड यही है,जितना मंहगा गिफ्ट, उतना ज्यादा प्यार ये नया ट्रैंड आज के युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा है। पूरे वेलेन्टाइन वीक को कुछ इस तरह बनाया गया है कि लगभग हर दिन कुछ--कुछ गिफ्ट देने पर ही प्यार टिकाऊ होता है। पूरा वेलेन्टाइन वीक बाज़ार के हिसाब से बना हैं, असली मजे तो गिफ्टशॉप वालों के आते हैं। क्या आज रिश्तें, उपहारों के मोहताज़ हो गए हैं?

कुछ लोगों का कहना है कि ये दिन प्यार ज़ाहिर करने के लिए बनाये गए हैं। लेकिन प्यार तो भावनाओं और आत्मा का विषय है। एक छोटा सा गुलाब भी दिल की बात कह सकता है जबकि लाखों की अंगूठी नहीं। वैसे भी जहां से ये वेलेन्टाइन वीक शुरू हुआ वहां क्यों डिवोर्स बढ़ते जा रहे हैं? क्यों वहां प्यार, भावनाओं और रिश्तों कि अहमियत को नहीं समझा जाता? सिर्फ प्यार की बातें करने से या प्यार के नाम एक दिन कर देने से कुछ नहीं होने वाला। लेकिन फिर भी ऐसे दिनों की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या तरक्की के इस दौर में हम रिश्तों की अहमियत भूलते जा रहे हैं? आज प्यार, प्यार नहीं बल्कि दिखावा नज़र आता है। रिश्तें मूल्य खोते जा रहे हैं, बस शेष रह गयी है तो औपचारिकताएं जो ऐसे दिनों की शक्लों में नज़र आ रही हैं।

प्यार के इस बदलते स्वरूप को देखकर तो यह लगता है, कि आज हम इन ढाई आखर में छुपी भावनाओं को भूलते जा रहे हैं। ‘इश्क-मोहब्बत’ तो बस किताबों और फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं। आजकल के युवा तो हर वेलनटाइन तो अलग-अलग साथी के साथ मनाते नज़र आते है। प्यार पल में होता है और पल में खत्म भी हो जाता है। ये कैसा प्यार है, जो बदलता रहता हैं?

लेकिन ऐसा नहीं है, कि आज के समय में प्यार पूरी तरह से बाज़ारू हो गया है। आज भी प्यार शब्द की गहराईयों को समझने वाले लोग हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ प्यार की खातिर लोग जान तक गंवा बैठे हैं। प्यार की खातिर ही समाज से लड़ गए, तो कहीं धर्म जाति के बंधनों को भी प्यार ने ही तोड़ा है। प्यार केवल एक दिन का वेलनटाइन डे नहीं बल्कि ज़िदंगी भर एक दूसरे का साथ निभाना है। आज का समाज मशीनों से घिरा हुआ है जिससे इंसान भी एक तरह की मशीन ही बनता जा रहा हैं। ऐसे में जरूरत है तो दिल को मशीन बननें से रोकने की और प्यार शब्द के उस एहसास को समझने की जिसे हम भूलते जा रहे हैं, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब प्यार लफ्ज़ ही दुनिया से खो जाएगा।

बाकि आजकल के युवाओं के लिये एक कवि की नसीहत याद आती है -

सरल सीखना है, बुरी आदतों का,

मगर उनसे पीछा छुड़ाना कठिन है।

सरल ज़िन्दगी में युवक प्यार करना,

सरल हाथ में हाथ लेकर टहलना,

मगर हाथ में हाथ लेकर किसी का,

युवक ज़िन्दगी भर निभाना कठिन है।।

-हिमांशु डबराल himanshu dabral

Saturday, January 22, 2011

समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...

अपनी दमन और मुंबई यात्रा के दौरान समंदर में नाव में बैठा मैं कुछ सोच रहा था, उसी सोच ने इन पंक्तियों को जन्म दिया-


नीचे पानी का मंज़र है, ऊपर अम्बर है,

समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...


कहीं प्यार के सदहज़ार फूल खिलें हैं हर तरफ,

कहीं दिल की ज़मी सदियों से बंज़र है....

समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...


कहीं कोई आशिक जां गवा बैठता है महोब्बत में,

कही महबूब के हाथों में ही खंज़र है...

समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...

-हिमांशु डबराल

himanshu dabral

Wednesday, January 5, 2011

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये...

आप सभी को भी नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये...ये नया साल आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय रहे...



हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Wednesday, November 10, 2010

मैं दौलत शोहरत न चाहूँ....

मैं दौलत शोहरत न चाहूँ,
ये झूठी रौनक
न चाहूँ...

छोटा सा एक घरोंदा हो,
जहाँ फुर्सत के पलों को जी जाऊं...
मैं दौलत शोहरत न चाहूँ....

चोट मिले तों मुस्काऊं,
जब दर्द मिले तो मैं गाऊं...
मैं दौलत शोहरत न चाहूँ,..

आखों में बसूं न बसूं ,

दिल में तों मैं बस जाऊं...
मैं दौलत शोहरत न चाहूँ...

सड़कों पे उजालें हो न हो,
ज़हनों में अन्धेरें न चाहूँ...
मैं दौलत शोहरत न चाहूँ...

-हिमांशु डबराल himanshu dabral

Thursday, November 4, 2010

दिवाली कहें या दिवाला ?


‘दीपावली’, एक पावन त्यौहार। इस मौके पर दीप जलाकर अंधेरे को दूर किया जाता हैं, खुशियां मनायी जाती हैं, तरह-तरह की मिठाईयां, पकवान, पटाखे और नये कपड़े खरीदे जाते हैं, घरों की सफाई की जाती है। लेकिन इस बार दिवाली के मौके पर आम लोगों के चेहरे उतरे नजर आ रहे हैं। लोगों के चेहरे से त्योहार की रौनक की चमक दूर होने का कारण है महंगाई। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोडी है।
महंगाई की वजह से त्योहारों की खुशी भी कहीं खो गई है। सभी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। दिवाली आते ही घर का बजट गडबडाने का डर सताने लगता है। लेकिन करें भी तो क्या करें। बढ़ती मंहगाई ने अमीर व गरीब के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। आज अमीर और अमीर हो रहा है, ऐसे में वो तो महंगी से महंगी चीज बड़ी आसानी से खरीद सकते हैं लेकिन इस महंगाई के दौर में गरीब आदमी की तो मन गई दिवाली...वो तो सिर पकड़कर बैठ जाता है कि दिवाली कैसे मनाए। और अगर किसी तरह गरीब इंसान मंहगाई से बच भी जाये तो नकली मिठाई, नकली पटाखे आदि आपका दीवाला निकाल देंगे और रही-सही कसर प्रदूषण और शराबी लोग पूरी कर देंगे।

बहरहाल दिवाली आ तो गयी है, लेकिन वो दिवाली वाली बात कहीं नजर नहीं आ रही...कुछ साल पहले तक दिवाली की तैयारियां एक महीने पहले ही शुरु हो जाती थी...लगता था कोई बड़ा त्योहार आ रहा है, लेकिन हमारी परंपरायें और हमारे त्योहार आधुनिकता और बाजारवाद की भेट चढ रहे है...दिया जलाओं न जलाओं लेकिन कुछ मीठा हो जाये...पूजा करो न करो लेकिन दिवाली के जश्न में शराब जरुर पीयेंगे। बाजार भी दिवाली के साजो-समान से भरा तो हुआ है लेकिन ज्यादातर सामान चाईनीज है...मिट्टी के दियों कि जगह चाईनीज दिये और लाईटों ने ले ली है, यहां तक कि लक्ष्मी-गणेश भी चाईनीज है...वाह रे इंडिया...अब चाईनीज गणेश जी की पूजा भी चाईनीज में करेंगे शायद...

खैर ये चाईनीज चीजें भी गरीबों के लिये नहीं है, ऐसी स्थिति में आम आदमी बड़ी मुश्किल से दिवाली मना पाता है और दिवाली मनाने का खामियाजा 2-3 महिने तक खर्चों में कटोती करके भुगतता है...और गरीब आदमी की बात छोड़ ही दीजिये वो बेचारा दिवाली वाले दिन भर पेट खाना भी खा ले तो उसकी दिवाली तो मन गई समझो...गरीबों के लिये तो एक दिया तक जलाने के पैसे जुटाना भारी पड़ जाता है...सालभर अंधेरे में डूबी उनकी झोपड़ी दिवाली के दिन भी जगमागा नहीं पाती...उनके बच्चे भी दिवाली के दिन आसमान में रोशनी देखकर ही खुश हो जाते है या अमीरों के बच्चों की ओर टकटकी लगाये देखते रहते है...शायद कोई उन्हे भी पटाखे या फुलझड़ी दे दे। लाखों घरों में दिवाली खुशी नहीं बल्कि दुख और निराशा लेकर आती है... अब आप ही सोचिए इसे दिवाली कहें या दिवाला ?

-हिमांशु डबराल himanshu dabral

Tuesday, October 19, 2010

मेरे साथ हो तुम...

किसी खास के जाने के बाद भी उसके होने का एहसास हमेशा रहता है...लगता है जैसे वो यही हमारे पास है...उसी एहसास को शब्दों में पिरोने की मेरी कोशिश-

दिल का हंसी एहसास हो तुम

शायद मेरे पास हो तुम...

तन्हाईयों में अक्सर तुम्हे ढूँढता हूँ

हजारों में भी तुम्हें ढूँढता हूँ...

अँधेरों में, उजालों में, ज़िंदगी के ख़्यालों में

मेरे आफ़ताब हो तुम...

शायद मेरे पास हो तुम...

जब भी आँखें भर आती हैं

हर पल मुझे सताती हैं

कभी छलक भी जाती हैं...

आँखों के सैलाब में ही सही, मेरे साथ हो तुम

शायद मेरे पास हो तुम...

तुम दूर जितना जाते रहे, उतना ही करीब आते रहे

दिल के किसी कोने में, जख़्म बन मुस्कुराते रहे...

जख़्मों की ही सही, एक सौगात होती है

शायद मेरे पास हो तुम...

ख़्वाबों में ज़िंदगी हो, ज़िंदगी में ख़्वाब हो तुम

राहों में मंज़िल हो, और मंज़िल में राह हो तुम

राह-ए-मंज़िल में, ठोकर बनकर ही सही

हाँ...मेरे साथ हो तुम...

-हिमांशु डबराल

Wednesday, October 6, 2010

बदतर है...


क्या मंदिर है, क्या मज्जिद है,
दोनों एहसासों के घर है...

आखें बंद रखो तो शब्,
वरना हर वक्त सहर है...

मज़हब के नाम पर खूं बहाने वालों,
तुम्हारे सीने में दिल नही, पत्थर है...

उसे दिल में यूँ न बसा मेरे दोस्त,
उसके हाथ में गुल नही, नश्तर है...

ये सियासत जन्नत को जहन्नुम बनाकर छोड़ेंगी,
क्या गजब है नौजवानों के हाथो में किताबें नही, पत्थर है...


अब तो जागो हिंदोस्ता वालों,
मुल्क की हालत बद से बदतर है...

-हिमाँशु डबराल himanshu dabral

Friday, October 1, 2010

असुविधा के लिए खेद भी नही है...

अब बैंक में नही परचून की दुकान पर पैसे जमा करने पड़ेंगे...हैं न आजीब...घबराइए नहीं ये असुविधा सिर्फ स्टेट बैंक के खता धारको के लिए है...बस जेब संभल कर जाइयेगा, चूँकि वहां न गार्ड है और न ही दरवाजे...आज सुबह नॉएडा में सेक्टर 26 के एसबीआई में कुछ पैसे जमा कराने गया...वहा से मुझे सेक्टर 19 के एसबीआई ये कह कर बेझ दिया गया की हम दूसरी ब्रांच के खाते का कैश नही जमा करते...लेकिन सेक्टर 19 के एसबीआई में नयी जानकारी मिली की एसबीआई ने एको(EKO) नाम के नए सेंटर खोले है आप वहां जाइये वही कैश जमा होगा...मैं उस सेंटर को लगभग आधे घंटे ढूढता रहा...बड़ी देर बाद बहुत पूछने पर एक दुकान मिली जिसके ऊपर एसबीआई एको(EKO) लिखा था...आगे गया तों लाइन लगी थी, एक गन्दी सी फोटोकॉपी की गयी स्लिप मिली जिसे भरने को कहा गया...सब फर्जी सा लग रहा था, मैने अपनी तसल्ली के लिए एसबीआई के कॉल सेंटर में फ़ोन किया, पता चला नई सुविधा है, जिसके लिए इन दुकानदारों को ट्रेनिंग भी दी गयी है...मेरे तो ये समझ में नही आया की ये सुविधा है या असुविधा?? कोई भी व्यक्ति पैसे जमा कराने के लिए अब बैंक नही बल्कि किसी गली महोल्ले की दुकान पर जाये...और लाइन में भी लगे...आगे बढा तो वहां नंबर भी मिल रहे थे...17 न.चल रहा था मेरा न. 41 था...काफी देर बाद भी न. नही आया...जो पैसे ले रहा था उससे मैने पूछा की कितना समय लगेगा??? उसने कहा की आधा पौन घंटा लगेगा तब तक चाय सिगरेट पी आओ...एक आदमी जिसका न. था वो उससे कह रहा था की जल्दी पैसे लो...उसने पास कड़ी महिला की ओर इशारा करते हुए कहा की जरा दूध दे दू बहन जी को फिर पैसे लेता हुं...काफी देर वहां खड़ा रहा और परेशां होकर वापस सेक्टर 26 के एसबीआई गया, एसबीआई के कर्मचारियों को भी एको के बारे में पता नही था, वें एक दुसरे से पूछ रहे थे....तभी उनमे से एक कर्मचारी ने सबको बताया की हाँ ऐसा भी है...मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ की जब एसबीआई में काम करने वाले लोगों को इसके बारे में पता नही है तो फिर आम जनता को कैसे पता चलेगा, खैर मैं मेनेजर से मिलने चला गया...जब उन्हें मैने ये बताया तो उनके चेहरे को देख कर लग रहा था की उन्हें भी नही पता इस असुविधा के बारे में...लेकिन वे बोली की आप 15 मिनट बातें मैं आपको फिर बुलाती हुं...20 मिनट बाद वो आई और बोली की वैसे तो हम दूसरी ब्रांच के खाते में कैश जमा नही करते लेकिन आप यही जमा करा दीजिये, मैं बोल देती हुं... मैने उनसे कहा की मैं तो करा दूंगा लेकिन बाकि लोगो का क्या जो उन दुकानों में लाइन में बिना सुरक्षा खड़े हैं...अगर किसी के भी हाथ से वहां कोई चोर पैसा ले जाये तो उसकी जिम्मेदारी एसबीआई लेगा क्या???? उन्होंने कोई जवाब नही दिया...और मुझे बोला की आप इनसे मिलले आपके खाते में कैश जमा हो जायेगा...मैने कैश जमा कराया और मुफ्त में शिकायत और सुझाव दोनों दे कर चला आया...लेकिन का बैंक में और ''एको'' मेरा मतलब उस पंसारी की दुकान में कही भी ये तक नही लिखा था की असुविधा के लिए खेद है...खैर लिखित तौर पर शिकायत और सुझाव दोनों बेझ रहा हुं...देखते है क्या होता है...लेकिन एसबीआई वालों को इतनी बड़ी असुविधा देने के बाद भी असुविधा के लिए खेद भी नही है...

-हिमांशु डबराल himanshu dabral

Thursday, September 30, 2010

स्वछंद करो...

राम जन्मभूमि विवाद पर फैसला तो आ गया है...दोनों पक्षों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रख कर फैसला लिया गया है... लेकिन इसके बाद बस धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों से अपील है की नफ़रत न फैलाये...माननीय न्यालय के फैसले का सम्मान करे....और-
यूँ नफरत की बारूद न बिखराओ साथी,
ये धर्म युद्ध का जहरीला नारा बंद करो...
जो प्यार तिजोरी सफों में बंद पड़ा है,
आओ उसके बंधन खोलो उसे स्वछंद करो...

-हिमांशु डबराल

Friday, September 3, 2010

सच, सच ही रहेगा...

आज एनडीटीवी इंडिया की एक खास रिपोर्ट देखी....सच में खास थी...कांग्रेस की जो चापलूसी की गयी वो देखने लायक थी....लोगो हटा दो तो कांग्रेस का चैनल लग रहा था...एनडीटीवी से ये उम्मीद नही थी...पूरी रिपोर्ट एक तरफ़ा...ये मीडिया न जाने कहा जा रहा है...लोगो को गलत ख़बरें देता है...कई बार सब बिका सा लगता है....अब इसके बाद कई लोग मुझ पर भगवा या लाल रंग लगा सकते है...लेकिन सच, सच ही रहेगा...

-हिमांशु डबराल