तुम पास तो हो मेरे, लेकिन फासले फिर भी है,मंजिल पर खड़ा हूँ मै, मगर रास्ते फिर भी है...
तुम पास तो हो मेरे....
यूँ तो चांदनी भी है, रौशनी भी है,
लेकिन दिलों में अँधेरे, फिर भी है...
तुम पास तो हो मेरे...
तुझमे सुनने की तासीर नहीं तो कान बंद रख हमे तो बेबाक बोलने की आदत है ....!!!
आज 15 अगस्त है...आज़ादी का दिन...कल से ही मोबाईल पर मेसेज आने शुरू हो गए थे और आज तों इन्बोक्स भर गया..कोई शहीदों की दुहाई दे रहा है तो कोई आज़ाद भारत की उपलब्धिया गिना रहा है...कुछ लोग शर्म के मारे मेसेज कर रहे थे क्यूकी वो रोज डे, फलाना डे, ढिमका डे सबको विश करते है...और कुछ तो केवल इसलिए मेसेज कर रहें है की उन पर आरोप न लगे की वो देशभक्त नही है...लेकिन देशभक्ति दिखने का ये अच्छा तरीका है...वाह...मैने किसी को मेसेज नही बेझा...न मैं किसी कार्यक्रम में गया...क्या करता जाकर भी...बचपन से जाता रहा हुं...स्कूल में जाते थे तो लड्डू मिलता था...नाम था आज़ादी का लड्डू , वो लड्डू खाने से पहले देश भक्ति के गाने गए जाते थे...भाषण सुनाये जाते थे...उस समय आज़ादी का मतलब नही पता था...लेकिन आज जब पता है तो सोचता हुं की हम सच में आज़ाद है??? शायद नही...हम शायद आज भी गुलाम हैं..मानसिक रूप से...तभी तो आज़ादी के असली मायनो को आज तक नहीं समझ पाए...फिर से वो दिन लौट कर क्यों नही आते,
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...
यूँ तो दिन भी रोज आते हैं और रातें भी,
लेकिन वो रातें, वो दिन फिर नही आते...
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...
चाय पीने दूर तक चले जाना,
अचानक से घुमने का प्लान बनाना,
घुमने के लिए घर में झूट बोल कर आना,
अब तो वो दोस्त बहाने भी नही बनाते...
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों...
वो पहाड़ों में घूमना, वो मस्ती में झूमना,
लड़ के एक दुसरे से यूँ ही मुह मोड़ना,
वो लड़ना झगड़ना, वो अजीब सी बातें,
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...
कभी एक दुसरे के लिए मरने को तैयार हो जाना,
कभी आपस में ही दुश्मन बन जाना,
कभी यूँ ही हंसाते, कभी यूँ ही रुलाते,
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...
अब तो वो अपनी नयी दुनिया में खो गये है,
पहले अपने थे हम, अब बेगाने हो गये है,
पहले तो बात किये बगैर रह नही सकते थे,
अब तो उनके पयाम भी नही आते...
फिर से मेरे दोस्त मुझे क्यों नही सताते...
-हिमांशु डबराल
किस मोड़ पे तो पता नहीं, हाँ लेकिन एक ऐसे मोड़ पर लाकर ज़रूर खड़ा कर दिया है, जहाँ मोहब्बत बाज़ारू नज़र आ रही है। वेलेन्टाइन वीक चल रहा है। बाज़ार, प्यार के तोहफ़ों से सजा हुआ है, तोहफों की भरमार है बशर्ते आपकी जेब में दाम हो! वैसे भी नया ट्रैण्ड यही है,‘जितना मंहगा गिफ्ट, उतना ज्यादा प्यार’। ये नया ट्रैंड आज के युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा है। पूरे वेलेन्टाइन वीक को कुछ इस तरह बनाया गया है कि लगभग हर दिन कुछ-न-कुछ गिफ्ट देने पर ही प्यार टिकाऊ होता है। पूरा वेलेन्टाइन वीक बाज़ार के हिसाब से बना हैं, असली मजे तो गिफ्टशॉप वालों के आते हैं। क्या आज रिश्तें, उपहारों के मोहताज़ हो गए हैं? कुछ लोगों का कहना है कि ये दिन प्यार ज़ाहिर करने के लिए बनाये गए हैं। लेकिन प्यार तो भावनाओं और आत्मा का विषय है। एक छोटा सा गुलाब भी दिल की बात कह सकता है जबकि लाखों की अंगूठी नहीं। वैसे भी जहां से ये वेलेन्टाइन वीक शुरू हुआ वहां क्यों डिवोर्स बढ़ते जा रहे हैं? क्यों वहां प्यार, भावनाओं और रिश्तों कि अहमियत को नहीं समझा जाता? सिर्फ प्यार की बातें करने से या प्यार के नाम एक दिन कर देने से कुछ नहीं होने वाला। लेकिन फिर भी ऐसे दिनों की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या तरक्की के इस दौर में हम रिश्तों की अहमियत भूलते जा रहे हैं? आज प्यार, प्यार नहीं बल्कि दिखावा नज़र आता है। रिश्तें मूल्य खोते जा रहे हैं, बस शेष रह गयी है तो औपचारिकताएं जो ऐसे दिनों की शक्लों में नज़र आ रही हैं। प्यार के इस बदलते स्वरूप को देखकर तो यह लगता है, कि आज हम इन ढाई आखर में छुपी भावनाओं को भूलते जा रहे हैं। ‘इश्क-मोहब्बत’ तो बस किताबों और फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं। आजकल के युवा तो हर वेलनटाइन तो अलग-अलग साथी के साथ मनाते नज़र आते है। प्यार पल में होता है और पल में खत्म भी हो जाता है। ये कैसा प्यार है, जो बदलता रहता हैं? लेकिन ऐसा नहीं है, कि आज के समय में प्यार पूरी तरह से बाज़ारू हो गया है। आज भी प्यार शब्द की गहराईयों को समझने वाले लोग हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ प्यार की खातिर लोग जान तक गंवा बैठे हैं। प्यार की खातिर ही समाज से लड़ गए, तो कहीं धर्म जाति के बंधनों को भी प्यार ने ही तोड़ा है। प्यार केवल एक दिन का वेलनटाइन डे नहीं बल्कि ज़िदंगी भर एक दूसरे का साथ निभाना है। आज का समाज मशीनों से घिरा हुआ है जिससे इंसान भी एक तरह की मशीन ही बनता जा रहा हैं। ऐसे में जरूरत है तो दिल को मशीन बननें से रोकने की और प्यार शब्द के उस एहसास को समझने की जिसे हम भूलते जा रहे हैं, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब प्यार लफ्ज़ ही दुनिया से खो जाएगा। बाकि आजकल के युवाओं के लिये एक कवि की नसीहत याद आती है - सरल सीखना है, बुरी आदतों का, मगर उनसे पीछा छुड़ाना कठिन है। सरल ज़िन्दगी में युवक प्यार करना, सरल हाथ में हाथ लेकर टहलना, मगर हाथ में हाथ लेकर किसी का, युवक ज़िन्दगी भर निभाना कठिन है।।
-हिमांशु डबराल himanshu dabral
अपनी दमन और मुंबई यात्रा के दौरान समंदर में नाव में बैठा मैं कुछ सोच रहा था, उसी सोच ने इन पंक्तियों को जन्म दिया-
नीचे पानी का मंज़र है, ऊपर अम्बर है,
समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...
कहीं प्यार के सदहज़ार फूल खिलें हैं हर तरफ,
कहीं दिल की ज़मी सदियों से बंज़र है....
समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...
कहीं कोई आशिक जां गवा बैठता है महोब्बत में,
कही महबूब के हाथों में ही खंज़र है...
समंदर है, समंदर है...चारों ओर समंदर है...
-हिमांशु डबराल
himanshu dabral

दिल का हंसी एहसास हो तुम
शायद मेरे पास हो तुम...
तन्हाईयों में अक्सर तुम्हे ढूँढता हूँ
हजारों में भी तुम्हें ढूँढता हूँ...
अँधेरों में, उजालों में, ज़िंदगी के ख़्यालों में
मेरे आफ़ताब हो तुम...
शायद मेरे पास हो तुम...
जब भी आँखें भर आती हैं
हर पल मुझे सताती हैं
कभी छलक भी जाती हैं...
आँखों के सैलाब में ही सही, मेरे साथ हो तुम
शायद मेरे पास हो तुम...
तुम दूर जितना जाते रहे, उतना ही करीब आते रहे
दिल के किसी कोने में, जख़्म बन मुस्कुराते रहे...
जख़्मों की ही सही, एक सौगात होती है
शायद मेरे पास हो तुम...
ख़्वाबों में ज़िंदगी हो, ज़िंदगी में ख़्वाब हो तुम
राहों में मंज़िल हो, और मंज़िल में राह हो तुम
राह-ए-मंज़िल में, ठोकर बनकर ही सही
हाँ...मेरे साथ हो तुम...
-हिमांशु डबराल

अब तो जागो हिंदोस्ता वालों,
मुल्क की हालत बद से बदतर है...
-हिमाँशु डबराल himanshu dabral
अब बैंक में नही परचून की दुकान पर पैसे जमा करने पड़ेंगे...हैं न आजीब...घबराइए नहीं ये असुविधा सिर्फ स्टेट बैंक के खता धारको के लिए है...बस जेब संभल कर जाइयेगा, चूँकि वहां न गार्ड है और न ही दरवाजे...आज सुबह नॉएडा में सेक्टर 26 के एसबीआई में कुछ पैसे जमा कराने गया...वहा से मुझे सेक्टर 19 के एसबीआई ये कह कर बेझ दिया गया की हम दूसरी ब्रांच के खाते का कैश नही जमा करते...लेकिन सेक्टर 19 के एसबीआई में नयी जानकारी मिली की एसबीआई ने एको(EKO) नाम के नए सेंटर खोले है आप वहां जाइये वही कैश जमा होगा...मैं उस सेंटर को लगभग आधे घंटे ढूढता रहा...बड़ी देर बाद बहुत पूछने पर एक दुकान मिली जिसके ऊपर एसबीआई एको(EKO) लिखा था...आगे गया तों लाइन लगी थी, एक गन्दी सी फोटोकॉपी की गयी स्लिप मिली जिसे भरने को कहा गया...सब फर्जी सा लग रहा था, मैने अपनी तसल्ली के लिए एसबीआई के कॉल सेंटर में फ़ोन किया, पता चला नई सुविधा है, जिसके लिए इन दुकानदारों को ट्रेनिंग भी दी गयी है...मेरे तो ये समझ में नही आया की ये सुविधा है या असुविधा?? कोई भी व्यक्ति पैसे जमा कराने के लिए अब बैंक नही बल्कि किसी गली महोल्ले की दुकान पर जाये...और लाइन में भी लगे...आगे बढा तो वहां नंबर भी मिल रहे थे...17 न.चल रहा था मेरा न. 41 था...काफी देर बाद भी न. नही आया...जो पैसे ले रहा था उससे मैने पूछा की कितना समय लगेगा??? उसने कहा की आधा पौन घंटा लगेगा तब तक चाय सिगरेट पी आओ...एक आदमी जिसका न. था वो उससे कह रहा था की जल्दी पैसे लो...उसने पास कड़ी महिला की ओर इशारा करते हुए कहा की जरा दूध दे दू बहन जी को फिर पैसे लेता हुं...काफी देर वहां खड़ा रहा और परेशां होकर वापस सेक्टर 26 के एसबीआई गया, एसबीआई के कर्मचारियों को भी एको के बारे में पता नही था, वें एक दुसरे से पूछ रहे थे....तभी उनमे से एक कर्मचारी ने सबको बताया की हाँ ऐसा भी है...मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ की जब एसबीआई में काम करने वाले लोगों को इसके बारे में पता नही है तो फिर आम जनता को कैसे पता चलेगा, खैर मैं मेनेजर से मिलने चला गया...जब उन्हें मैने ये बताया तो उनके चेहरे को देख कर लग रहा था की उन्हें भी नही पता इस असुविधा के बारे में...लेकिन वे बोली की आप 15 मिनट बातें मैं आपको फिर बुलाती हुं...20 मिनट बाद वो आई और बोली की वैसे तो हम दूसरी ब्रांच के खाते में कैश जमा नही करते लेकिन आप यही जमा करा दीजिये, मैं बोल देती हुं... मैने उनसे कहा की मैं तो करा दूंगा लेकिन बाकि लोगो का क्या जो उन दुकानों में लाइन में बिना सुरक्षा खड़े हैं...अगर किसी के भी हाथ से वहां कोई चोर पैसा ले जाये तो उसकी जिम्मेदारी एसबीआई लेगा क्या???? उन्होंने कोई जवाब नही दिया...और मुझे बोला की आप इनसे मिलले आपके खाते में कैश जमा हो जायेगा...मैने कैश जमा कराया और मुफ्त में शिकायत और सुझाव दोनों दे कर चला आया...लेकिन का बैंक में और ''एको'' मेरा मतलब उस पंसारी की दुकान में कही भी ये तक नही लिखा था की असुविधा के लिए खेद है...खैर लिखित तौर पर शिकायत और सुझाव दोनों बेझ रहा हुं...देखते है क्या होता है...लेकिन एसबीआई वालों को इतनी बड़ी असुविधा देने के बाद भी असुविधा के लिए खेद भी नही है...
-हिमांशु डबराल himanshu dabral
आज एनडीटीवी इंडिया की एक खास रिपोर्ट देखी....सच में खास थी...कांग्रेस की जो चापलूसी की गयी वो देखने लायक थी....लोगो हटा दो तो कांग्रेस का चैनल लग रहा था...एनडीटीवी से ये उम्मीद नही थी...पूरी रिपोर्ट एक तरफ़ा...ये मीडिया न जाने कहा जा रहा है...लोगो को गलत ख़बरें देता है...कई बार सब बिका सा लगता है....अब इसके बाद कई लोग मुझ पर भगवा या लाल रंग लगा सकते है...लेकिन सच, सच ही रहेगा...
-हिमांशु डबराल
मीडिया की पढाई वाली दुकानों की भरमार हो गयी है...ऐसे में पत्रकार बनने के लिए सिर्फ जेबे गरम होनी चाहिए...लेकिन इस क्षेत्र में आने वाले नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है...न शिक्षा का स्तर और न कुछ प्रेटिकल जानकारी...वहा तो सिर्फ पैसा बटोरने का काम होता है... इन दुकानों में इन्हें रंगीन सपने दिखाए जाते है और कोर्स पूरा होने पर सपनो की ये रंगीन दुनिया काली हो जाती है...पत्रकार बनना इतना आसन हो गया है की आजकल राह पे चलता हर चौथा आदमी अपने को पत्रकार बताता है...सब इन दुकानों के कारणहो रहा है... ऐसी दुकानों को चलाने वालो की दुकानों में आग लगाने का मन करता है....
-हिमांशु डबराल