Friday, April 9, 2010

नम होगा...

अश्को के सागर में, अश्को को बहाकर क्या होगा,

बहाना ही तों अश्क सहरा में बहाओ, कम से कम कमबख्त रेत का रुख तो कुछ नम होगा...

-हिमांशु डबराल

Wednesday, March 17, 2010

‘जनवाणी’ से ‘सत्ता की वाणी’ तक का सफर…


मीडिया पर आये दिन सवाल खड़े हो रहे हैं, विश्वसनीयता भी कम हुई है। बाजारीकरण का मीडिया पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। खबरों और मीडिया के बिकने के आरोपों के साथ-साथ कई नए मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में पत्रकारिता को किसी तरह अपने बूढे क़न्धों पर ढो रहे पत्रकारों के माथे पर बल जरूर दिखायी दे रहे हैं।
भारत में पत्रकारिता का इतिहास बड़ा गौरवशाली रहा है। आजादी के दीवानों की फौज में काफी लोग पत्रकार ही थे, जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक देश व समाज के लिये कार्य किये। लेकिन ये बातें अब किताबों और भाषणों तक ही रह गई हैं। जैसी परिस्थितियों से उस दौर के पत्रकारों को गुजरना पड़ता था, आज के पत्रकारों को भी सच कहने या सच लिखने पर वैसे ही दौर से गुज़रना पड़ता है। सच कहने वालों को सिरफिरा कहा जाता है और उन्हें नौकरी नहीं मिलती, मिल जाये तो उन्हें निकाल दिया जाता है। इसके बावजूद भी कई ऐसे लोग है जो सही पत्रकारिता कर रहे हैं।
2009 के लोकसभा चुनावों में मीडिया का वो स्वरूप देखने को मिला जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी, वो था मीडिया का बिकाऊ होना। हालांकि चुनाव के समय में इस तरह की छुटपुट घटनाएं सामने आती रहती थीं, लेकिन इस बार सारी हदें पार हो गईं। कुछ अखबार व कुछ समाचार चैनलों को छोड़ दें तो पूरा मीडिया बिका हुआ नजर आया। ऐसा होना सच में शर्मनाक था और लोकतन्त्र के लिये दुर्भाग्यपूर्ण। खबरें, यहां तक कि संपादकीय भी पैकेजों में बेचे जाने लगे। एक पृष्ठ पर एक ही सीट के दो-दो उम्मीदवारों को मीडिया विजयी घोषित करने लगा और हद तो तब हो गई जब मीडिया ने पैकेज न मिलने पर प्रबल उम्मीदवार के भी हारने के आसार बता दिये।
पैसे से पत्रकार व पत्रकारिता खरीदी जा रही है। लेकिन जो बिक रहा है शायद वो पत्रकारिता का हिस्सा कभी था ही नहीं। सत्ता में बैठे लोगों की भाषा आज की पत्रकारिता बोल रही है और नहीं तो पैसे की भाषा तो मीडिया द्वारा बोली ही जा रही है। कुछ एक को इन बातों से ऐतराज हो सकता है, लेकिन आंखे बंद करके चलना भी ठीक नहीं है। बाकी मीडिया का जनवाणी से सत्ता की वाणी बनने तक का सफर काफी कुछ इसी तरह चलता रहा।
रही-सही कसर पत्रकारिता में आए नौजवानों ने पूरी कर दी है। एक ओर ज्ञान की कमी, दूसरी ओर जल्दी सब कुछ पा लेने की इच्छा और पैसे कमाने की होड़ ने इन्हें आधारहीन पत्रकारिता की ओर मोड़ दिया है। प्रतिस्पर्धा के दबाव ने भी नौजवानों को पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता करने पर विवश कर दिया है। वैसे दोष उनका भी नहीं है। लाखों रूपए खर्च करने के बाद बने इन डिग्रीधारक पत्रकारों से मूल्यों की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
खैर, हम तो बस इसी ख्याल में बैठे हैं कि मीडिया जल्द ही पुन: जनवाणी बन जायेगा… लेकिन मन यही कहता है कि,
‘दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है गालिब…।’
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- हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Tuesday, March 16, 2010

नववर्ष मंगलमय हो...


सभी को भारतीय नववर्ष सम्वत् २०६७ विक्रमी ("शोभन" नामक सम्वत्सर) तथा नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनायें।आप सभी के लिए ये नया साल नयी खुशियाँ ले कर आयें और मंगलमय रहे...


-हिमांशु डबराल

Wednesday, March 10, 2010

वो अच्छा है...


जिंदगी में, बंदगी में, आरज़ू में, गुफ़्तगू में,
जो भी मिले वो अच्छा है...
बात में, साथ में, उपहास में या सौगात में,
जो भी मिले वो अच्छा है...
रंग में, संग में और ढंग में,
जो भी मिले वो...
रात में, बरसात में, हाथ में या मुलाकात में,
जो भी मिले वो...
अंधेरों में, उजालों में, चाय के दो प्यालो में
और घटा से उन बालों में,
जो भी मिले वो...
ठोकर में, ढ़ोकर में और जोकर में,जो भी मिले वो...
प्यार में, इजहार में, तकरार में और इस संसार में,
जो भी मिले वो...
गीत में, रीत में, प्रीत में, मीत में या जीत में,
जो भी मिले वो...
सागर में, सहरा में, तेरा में या मेरा में,
जो भी मिले वो...

खेल में, मेल में, जेल में और सेल में,
जो भी मिले वो...

-हिमांशु डबराल
himanshu dabral

क्या हो?

क्या हो जब जिंदगी रंग न लाये,
क्या हो जब जिंदगी के रंग उड़ जाये...
क्या हो जब तुम बदल जाओ,
क्या हो जब हम बदल जाये....
-हिमांशु डबराल

Monday, March 8, 2010

महिला दिवस की शुभकामनाये...

मेरी ओर से सभी महिलाओं को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाये...
फूल नही चिंगारी है,
भारत की ये नारी है...
-हिमांशु डबराल

Friday, March 5, 2010

सिक्के का दूसरा पहलू.....

आज मैने एक ब्लॉग पर एक कहानी पढ़ी...वो लड़का( यहाँ पढ़ें- http://imnindian-bakbak.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html).उस कहानी को पढने के बाद मुझे एक लड़की की कहानी याद आ गयी..जो लिखी है...शायद इसके बाद कुछ लोग इसे पुरुषवादी मानसिकता से लिखा हुआ बताये...लेकिन मै तों बस सिक्के का दूसरा पहलू दिखाना चाहता हूँ....शायद आईना...शायद सच...
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वो लड़की...
एक लड़की थी...जिसकी शादी तय हुई...उस लड़की के लिए शादी सिर्फ एक बंधन थी...पर घर वालों की मर्ज़ी के आगे वो कुछ नहीं कर पाई...मज़बूरी में उसे शादी के लिए हाँ करना पड़ा...उसका होने वाला पति उसको बहुत प्यार करता था...वो उसके लिए बहुत गिफ्ट ले कर आता था...
उसे हमेशा खुश रखना चाहता था... लेकिन वो उस लड़के के साथ बाहर घुमने जाने में आनाकानी करती थी...उसे डर था की उसके कोई पुराने बॉयफ्रेंड्स न मिल जाये...अगर मिल गये तो उसका कच्चा-चिठ्ठा खुल जायेगा...
उसे आपने कमरे में भी नही आने देती थी...क्यूकी उस कमरे में उसके पुराने बॉयफ्रेंड्स के गिफ्ट्स रखे थे...
उसने इससे पहले कई लडको को धोका दिया था...
और शायद इस लड़के को भी धोका देना चाहती थी...वो ये भी नही जानती थी की उसने कितनी बार खुद को धोखा दिया है...पैसे की चाह ने उसे अन्धा कर दिया था...
उसके लिए रिश्तों का मतलब सिर्फ पैसा और ऐश था...मौज मस्ती का एक जरिया इससे ज्यादा कुछ नही...
उसके लिए बॉयफ्रेंड सिर्फ कार की तरह थे जिसे बोर हो जाने पर बदल दिया जाता है...घर में खड़ा करके नही रखा जाता...और रखा भी जाता है तो भी उसे उपयोग नही किया जाता...घुमा तो नयी गाड़ी में जाता है...
ऐसे में क्या कहा जाये...
किन्तु अब बात पूरी लगती है... "वो लड़का और वो लड़की''...लेकिन सिक्के का तीसरा पहलू भी है...सोचते रहिये...पर्दा जल्द उठेगा

हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Monday, February 15, 2010

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया…

किस मोड़ पे तो नहीं, हां लेकिन एक ऐसे मोड़ पर लाकर जरूर खड़ा कर दिया है, जहां मोहब्बत बाज़ारी नज़र आ रही है। वेलनटाइन वीक चल रहा है, बाज़ार प्यार के तोहफों से लदा हुआ है, हर आदमी की जेब के हिसाब से तोहफे बिक रहे है। ऐसे में एक नया ट्रेण्ड शुरू हो गया है, ‘जितना मंहगा गिफ्ट उतना ज्यादा प्यार’। ये सब आजकल के युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा है पूरे वेलनटाइन वीक को कुछ इस तरह बनाया गया है कि लगभग हर दिन कुछ-न-कुछ गिफ्ट देना ही पड़ता है। क्या आज रिश्ते इन उपहारों के मोहताज़ हो गए है?कुछ लोगों का कहना है कि ये दिन प्यार जाहिर करने के लिए बनाये गए हैं। लेकिन प्यार तो भावनाओं और आत्मा का विषय हैं। एक छोटा सा गुलाब भी दिल की बात कह सकता है जबकि करोड़ों की अंगूठी नहीं।
लेकिन फिर भी ऐसे दिनों की जरूरत क्यों पड़ी? क्या तरक्की के इस दौर में हम रिश्तों की अहमियत भूलते जा रहें हैं? आज प्यार प्यार नहीं, दिखावा नज़र आता है। रिश्‍ते मूल्य खोते जा रहे है, बस शेष रह गयी है तो औपचारिकताएं जो ऐसे दिनों की शक्लों में नज़र आ रही है।
प्यार के इस बदलते स्वरूप को देखकर तो यह लगता है कि आज हम इन ढ़ाई आखर में छुपी भावनाओं को भूलते जा है। ‘इश्क-मोहब्बत’ तो बस किताबों और फिल्मों में ही अच्छे लगते हैं। आजकल के युवा तो हर वेलनटाइन तो अलग-अलग साथी के साथ मनाते है। प्यार पल में होता है और पल में खत्म भी हो जाता है…ये कैसा प्यार है जो बदलता रहता हैं?
लेकिन ऐसा नहीं है, कि आज के समय में प्यार पूरी तरह से बज़ारी हो गया है। आज भी प्यार शब्द की गहराइयों को समझने वाले लोग है। ऐसे कई मामले सामने आए है, जहां प्यार की खातिर लोग जान तक गंवा बैठे है…प्यार की खातिर ही समाज से लड़ गए, तो कहीं धर्म जाति के बंधनो को भी प्यार ने ही तोड़ा है।
आज का समाज मशीनों से घिरा हुआ है जिससे इंसान भी एक तरह की मशीन ही बनता जा रहा हैं। ऐसे में जरूरत है तो दिल को मशीन बननें से रोकने की और प्यार शब्द के उस एहसास को समझने की जिसे हम भूलते जा रहे है, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब प्यार लफ्ज़ ही दुनिया से खो जाएगा।
और क्या कहूं बस आज के युवाओं के लिये एक कवि की नसीहत याद आती है-

सरल सीखना है, बुरी आदत का,

मगर उनसे पीछा छुड़ना कठिन है।

सरल जिन्दगी में युवक प्यार करना,

सरल हाथ में हाथ लेकर टहलना,

मगर हाथ में हाथ लेकर किसी का,

युवक जिन्दगी भर निभाना कठिन हैं॥

-हिमांशु डबराल

himanshu dabral

Friday, February 12, 2010

सजा बन जाओ तुम...


दिल के रंजो-ग़म की दवा बन जाओ तुम,
या दिल के ज़ख्मो को जो दे सुकूं, एक बार ऐसी हवा बन जाओ तुम...

इस कदर चाहा है तुमको रात-दिन,
मेरी रूह में बसकर, मेरे ख़ुदा बन जाओ तुम...

कभी ख्वाबों में, यादों में क्यों आते हो तुम,
आना है तो, मेरी यादों का काफिला बन जाओ तुम...

जाने से तेरे, रुक सा गया है सब कुछ,
जो थम गया है, वो सिलसिला बन जाओ तुम...

हो सके तो एक बार फिर चाहो मुझे इतना,
दुनिया के लिए महोब्बत की, इन्तहां बन जाओ तुम...

तेरे आने की उम्मीद में कब से बैठे है हम,
ख़त्म करदे जो मेरी आस, ऐसा ज़लज़ला बन जाओ तुम...
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कुछ ऐसा करो मेरे एहसासों के साथ,
रोते-रोते हँसने की अदा बन जाओ तुम...

तोड़ना है तो मेरे दिल को इस कदर तोड़ो,
मेरी वफ़ाओ की सजा बन जाओ तुम...


-हिमांशु डबराल

Wednesday, January 20, 2010

कानून सिर्फ गरीबों के लिये अमीरों के लिये नहीं..

ठंड का मौसम, पसरा हुआ कोहरा, सर्द हवाएं, खुला आसमान और उस पर तन पर ना के बराबर कपड़े। जरा सोचिये ऐसी स्थिति में कोई भी आदमी कैसे रह सकता है। लेकिन भारत में लाखों लोग ऐसे है जो इस तरह जीने पर मजबूर है। सर्दी से बचने के नाम पर उनके पास सिर्फ चन्द कपड़े है। अकेले दिल्ली में हजारों लोग ऐसे बदतर हालात में गुजर-बसर कर रहे है। और सरकार द्वारा इनके लिये कोई खास इंतजाम नहीं किये जा रहे, उल्टा इतनी सर्दी में बिना नोटिस के दिल्ली सरकार और एम.सी.डी. गरीबों के बसेरों को उजाड़ने का काम कर रही है। ये सब राष्ट्रमंडल खेलों के मददेनजर किया जा रहा है। इन गरीबों के लिये बसेरे कि जिम्मेदारी भी सरकार और एम.सी.डी. की है, हालांकि खाना पूर्ति के लिये झुग्गियां उजाडने के बाद कुछ तम्बु जरूर लगा दिये गये, जो पर्याप्त नहीं थे। लेकिन इन सबके बीच उस 6 दिन के बच्चे का क्या कसूर जिसको उसकी मां खुले आसमान के नीचे सुलाने की नाकाम कोशिश कर रहीं थी। सवाल यहीं उठते है की दिल्ली सरकार मानवता तक भूल गयी है? ये वहीं सरकार है न जिसने इन लोगो को यहां के पते वाले वोटर कार्ड दिये थे? वोट लेते समय तो नेता जी ने भी बड़े-बड़े वादे किये होंगे, पर अब वो वादे और वो नेता कहां है?
दिल्ली को साफ-सुथरा बनाया जा रहा है। अवैध निर्माणों को हटाया जा रहा है। लेकिन क्या ये सब गरीबों के लिये ही है? दिल्ली के अन्दर कई एसी अवैध कॉलोनियां है जिनमे अमीर व रसूख वाले लोग रहते है, उन पर न तो एम.सी.डी. और न दिल्ली सरकार कोई कदम उठा रही है। उल्टा दिल्ली सरकार द्वारा अवैध जगहो पर वैध बिजली व पानी के कनेक्शन बाटे जा रहे हैं। इस सबको क्या कहा जाए? वो अमीर और रसूख वाले लोग तो अपने-अपने घरो में रजाई में बैठे चाय की चुस्की का मजा ले रहे होंगे लेकिन गरीब और बेघर लोग तो बस इस ठंड में किसी तरह जीने की जद्दोजहद में लगे होंगे। कानून सिर्फ गरीबों और मज़लूम लोगों पर ही लागू होता है क्या? और ऐसे में गरीबों की पैरवी करने वाले और मानवाधिकार के लिये चिल्लाने वाले लोग कहां सोये हुए है? उनके कानों में तो जूं भी नहीं रेंग रही है।
गरीब आदमी की जिन्दगी तो बस एसे ही कटती रहेगी और हम अपने-अपने एयर टाइट कमरों मे मज़े से आराम की नींद लेते रहेंगे…चलिये अपने दिल को यूं ही बहलाइये की ”हम कर भी क्या सकते है?” और सो जाइए…मेरी ओर से जब सोओ तब गुड नाइट।
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-हिमांशु डबराल
himanshu dabral

Wednesday, January 13, 2010

बहुत याद आओगे तुम...


जब भी हम मुस्कुराएंगे, यू ही गुनगुनायेंगे
सपनो को सजायेंगे, कागज की नाव बनायेंगे
अँधेरे से
घबराएँगे, पर पास तुम्हे न पाएंगे
तो बहुत याद आओगे तुम...

जब भी सोचेंगे पुरानी
हर बात
तुम्हारा वो हंसी साथ,
जगमगाती वो
चांदनी रात
उसमे होती वो बरसात,
भीगे तन और भीगे मान की वो सौगात
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...
.
जब भी ढूढेंगे वो मस्ती,
पढने में वो सुस्ती
जब ख़ुशी होती थी बड़ी
सस्ती,
सबकी होती कुछ अपनी
कुछ हस्ती
जगमगाती थी हर बस्ती,
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...
.
जब भी ढूढेंगे यारों का साथ
मदद को बढ़ता वो हाथ,
सबके लिए प्यार, बच्चों का दुलार
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...

वो हंसी वादियाँ,
वो कोहरे की चादर
ठण्ड की कपकपाहट, बादलों का वो जहाँ
और उसमे चाय की वो चुस्की
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...

जब भी होंगे हम तन्हा
साथ न देगा कोई लम्हा,
जब भी बैठेंगे हम तनहाइयों में
दिल की रुसवाइयों में
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...

तुम्हारी वो अदा, वो मुस्कराहट, वो आहट
वो सादगी, वो खुशबु, जो महका गयी
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...

वो टूटते तारे को देखकर मन्नते मांगना
बारिश के पानी में कूदना
वो छीटें, वो पत्तें, वो पेड़, वो चिड़िया
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...
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वो तुम्हारी कहानी, तुम्हारा वों बोलना
मन की बातों को दिल से
खोलना

जब भी ढूढुगा वो सावन
अनमना
सा वो मन
जब भी सोचेंगे तो बहुत याद...

जब भी लिखेंगे कुछ, जब भी
पढेंगे
कुछ
जब भी कहेंगे कुछ, जब भी सुनेगे कुछ
हर लफ्ज में जगमगाओगे तुम
जब भी
सोचेंगे तो बहुत याद आओगे तुम...

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-हिमांशु डबराल

himanshu dabral

Saturday, January 9, 2010

Insulting Departed Soul


Ruchika Girhotra was resting peacefully after departing from her earthly abode, giving responsibility to her friend Aradhana and her parents to fight against not only her tormentor but also murderer.
She did not leave us because of her choice but was forced to by a beast in human form called S P S Rathor. She was prepared to fight and tolerate all inhuman treatment meted to her but her courage caved in after seeing insults and criminal charges inflicted on her Father and Brother. She was shattered by the treatment she got from her School, which is a second home for any child and a source of love, affection and moral courage.
Aradhana and her parents picked up the cudgel on Ruchika’s behalf thinking they have to fight only Khaki wearing monster, but on entering the arena it dawned on them that they were up against the whole Haryana political system irrespective of the parties they belong to as they pampered and promoted him in due course and also the bureaucratic family of the State.
Aradhana and her parents should be honored and bestowed national bravery award for standing up against such powerful lobby without having a fallback. Like communal riots during the partition and terrorist attacks on Kashmiri Pandits, this family was also made a refuge but they did not give up their fight for the right cause.
Our cool and patient judiciary after hearing the case for long nineteen years sentenced Rathor for SIX months imprisonment and a fine of Rs.1000/-. What Ruchika would have thought of this judgment if she could have risen form her ashes. All the pain, sorrow, humiliation would have gushed up and would have said loud and clear that her brutal murderer has been set free.
Our various NGO’s working for the cause of women or cry for women empowerment are surprisingly quiet or they will take another nineteen years to ponder and decide as to what line of action they should take against this unprecedented unjust sentence.
Men like Rathor if you can call them men are worst than Pandher and Koli put together because our constitution placed immense responsibility in their hands under oath and they very conveniently and scrupulously insult the trust.
Its time we should introspect as to who killed or rather who insulted the departed soul of Ruchika Girhotra, our politicans, our judicary by passing such a light sentence for such a heinous crime or our social structure which does not respond to any atrocities.
We need many more family like that of Aradhana.

-Rajive S Notyal

Friday, January 1, 2010

नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाए



मेरी ओर आप सभी को अंग्रेजी नव वर्ष की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाये...आप सभी के लिए आने वाला साल मंगलमय रहे...भगवान तथा बड़ों का आश्रीवाद सदा बना रहे...नया साल आपकी जिंदगी में खुशहाली और उन्नति लेकर आये...

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इसी कामना के साथ -
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हिमांशु डबराल

Monday, December 21, 2009

कुछ पंक्तिया दिल से ...

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मंजिल दिखती है मगर मिलती नही,
मिलती तब है जब दिखना बंद हो जाये .

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किसी के दिल में किसी के ख्वाबो को जब पनाह मिलती है,
तभी एक आशिक को उसके इश्क की सदा मिलती है .

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जब से हम तुमसे मिले, ये नज़र झुकती नही,
देखती है बस तुम्हे, अब तो ये थकती नही .

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मुझको अपना कहने वाले, अपनी आखों को आईने में देख,
खुद से नज़रे मिला सको तो ठीक, नही तो नज़र आएगा फरेब

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महोब्बत के रंग में यू रंग न जाना,
कि अपना रंग ही नज़र न आये,
कोई तुम्हे ढूढ़ते हुए आये और, पहचान भी न पाए .

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-हिमांशु डबराल
himanshu dabral



Thursday, December 10, 2009

26/11 को मत भूलों

एक साल पहले दहल गया था ‘पूरा देश’। मुम्बई में हुए सिलसिलेवार आंतकी हमलों ने पूरे देश में दहशत का माहौल पैदा कर दिया था। मौत का ऐसा मंजर किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। लाशों के ढेर में पसरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में गूंजती गोलियों की आवाजें। पूरा देश आतंकियों के खूनी खेल को अपने-अपने टीवी सेटों पर टकटकी लगाए देख रहा था। 26/11 को एक साल हो गया है लेकिन आज भी लोग उस खौफनाक मंजर को यादकर सहम जाते हैं। आज भी एक आम आदमी घर से निकलने के बाद पहले सोचता है कि शाम को घर लौटगा कि नहीं। जिन्होंने अपने करीबी खोये, जिस मां ने अपने बेटे को खोया, जो बच्चे अनाथ हो गए, उन सबकी जिन्दगी तो 26/11 के बाद जैसे रूक गयी है। हर हिन्दुस्तानी के दिल से यही आवाज निकल रही है कि ‘बहुत हुआ अब’।
इस समय सेना प्रमुख के बयान ने आंतकवाद के खिलाफ सरकार के रवैये को लेकर हकीकत जाहिर की। सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने कहा कि ”अमेरिका में 9/11 के बाद कुछ नहीं होता है। इंडोनेशिया में भी बाली में विस्फोट के बाद कुछ नहीं होता है। लेकिन हमारे यहां संसद के हमले के बाद 26/11 होता है, बस अब और नहीं।” हलांकि उनका ये बयान मुंबई हमले की बरसी के समय में आया। सेना प्रमुख का ये बयान भारतीय सेना के हौसले को दर्शाता है लेकिन एक सवाल भी खड़ा करता है कि अब तक आंतकवाद के खिलाफ हमारी सरकार ने कड़ा रवैया क्यों नही अपनाया? क्या 26/11 जैसे हमले का इंतजार हो रहा था?
संसद में हमले के बाद भी कोई कड़े कदम नहीं उठाये गये। जिसका खामियाजा 26/11 के रूप में देखने को मिला।
आज भी आतंकियों के हौसले बुलंद हैं। 26/11 की बरसी के मौके पर सरकार को सबक लेने की आवश्‍यकता है और आतंकवाद के खिलाफ कड़े रवैये को अपनाने की जरूरत है तभी देश आतंकवाद से मुक्त हो पायेगा।
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- हिमांशु डबराल